शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

जरूरत जिसको, सहयोग उसी को : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 03 अगस्त 2017, गुरूवार

  जरूरतजिसको सहयोग  उसी को : व्योमेेश चित्रवंश की डायरी, 03 अगस्त 2017, गुरूवार

          सिटी बस स्टाप पर रूकी, बस मे भीड़ तो नही थी पर कोई सीट खाली भी नही थी. स्टाप पर एक डिजाईनर टीशर्ट और आज के दौर के हिसाब से फैशन कही जाने वाली जगह जगह से फटी जीन्स पहन कर ऑखों पर गागल्स और कानों मे ईयरफोन चढ़ाये एक माडगर्ल बस मे चढ़ी. उसके चढ़ते ही बस मे डियोडरेन्ट के खूशबू का एक झोंका सा आ गया. बस के माहौल मे भी उस झोंके का असर होना ही था. माहौल पर असर बस दो चार मिनट मे ही दिखने लगा.
   "ऐ मिस्टर ...एक लेडीज खड़ी है और तुम इतने हट्टे कट्टे होकर आराम से बैठे हो,, बड़े ही शर्म की बात है,". 45 की उम्र में 50 के दिखने वाले ( शारीरिक रूप से ठीक - ठाक ) अंकल टाइप आदमी ने साईड वाली दूसरी सीट पर बैठे सारा दिन धूप में भाग दौड़ करने के बाद थके हुए 25-26 साल के लड़के को हूबहू 'आदेश' जैसा लग रहा 'आग्रह' किया .
.पर लड़के ने जरा भी रिस्पॉन्स ना दिया, एक तो वो बहुत थका हुआ भी था, दूसरा कुछ अंकल के ज्ञान को अनदेखा भी कर रहा था, आखिर में अंकल ने - सामने खड़ी आधुनिका लड़की के अधिकार के लिए ( मोबाइल में व्यस्त ) लड़के को जोर से हिलाया
और मोबाइल फोन को छीन लेने का उपक्रम किया 'सुनाई नहीं देता है तुझे ? कह रहा हूँ लेडीज है, बैठने दो उनको ... ..".
      और इसी सब चक्कर में लड़के का मोबाइल हाथ से छूटकर नीचे जा गिरा . एक तो लड़के की खुद की भी कुछ समस्याएँ हो सकती हैं .ऊपर से अंकल की बकलोली, आखिर  खून हर समय इतना सहिष्णु थोड़े ही हो सकता है.
     अब लड़का बिगड़ पड़ा ... 'तुम वकील हो इसके ,, हाँ ?? तब से चेपो चेपो करे जा रहे हो ,, मैं साला तुम्हारी उम्र का लिहाज कर के बोल नहीं रहा कुछ तो तुम सर पर चढ़ जाओगे ???
और काहे दूँ मैं सीट अपना किसी को ? टिकट मैं नहीं लिया हूँ क्या ?? या कि तुम्हारी तरह स्टाफ कहकर फ्री में चढ़ा हूँ ??  ये लड़की अपाहिज है या उसको चक्कर आ रहा है जो सीट छोड़ दूँ ?
साला रोज नारी सशक्तिकरण का नया नारा ले कर जलूस पर जलूस निकलता जा रहा है और तुम हो कि कहते हो लड़की है कमजोर है,,सीट छोड़ दो ... और इतना ही तुमको दिक्कत है तो साला ...तुम छोड़ दो ना सीट ,,, या इतना भैंसा जैसा शरीर लेकर अचार डालोगे इसका ?और ये बताओ इतना नारीवादी काहे हुए जा रहे हो ??अब मुझे टोके तो साला सारा नारीवाद मैं घुसा दूँगा यहीं पर' ..."
   लड़के का रौद्र रूप देख अंकल एक कोने में दुबक कर बैठ गए ,
,
फिर वापस एक शब्द ना निकला उनके मुँह से .....
दो स्टाॅप के बाद बस रुकी ..!!
कुछ सवारियाँ उतरीं , कुछ नई चढ़ी ...
कंडक्टर के चिल्लाने की आवाज आई - " ऐ बुढ़ीयाँ चढ़ना है तो चढ़ो जल्दी ... इतना टाइम नहीं है हमारे पास' ..!
बस के गेट से एक बूढ़ी अम्मा चढ़ी जिनकी देह एकदम पसीने में भीगी थी, उम्र का असर उनके हाँफने में दिख रहा था, खुद का भार संभालना मुश्किल हो रहा था ऊपर से इतना बड़ा थैला भी उठाई थी वो ,,
उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं था सिवाय उस लड़के के ...
.
बस में गियर लगते ही झटका लगा जिसने बूढ़ी अम्मा को लगभग गिरा ही दिया था अगर वो लड़का झट से खड़ा हो कर उन्हें संभाल ना लेता...
संभालने के साथ ही लड़के ने उसे अपनी सीट बूढ़ी अम्मा को ये कहते दे दी 'यहाँ आराम से बैठो अम्मा,, और टिकट मत लेना मैं जा के ले लूँगा' ,,
     शायद अम्मा यही दुआ कर रही थी की कोई उसकी टिकट कटा कर देदे इसीलिए बिना दाँतों वाली प्यारी सी मुस्कुराहट बिखेरते बैठ गयीं .
सामने बैठे अंकल लड़के की तरफ गौर से देख रहे थे जैसे कह रहे हो 'हम कहे तो नहीं दिए ..और अब सीट भी दे दिए और टिकट भी कटा लिए बूढ़ी का"
     इधर से लड़का भी मुस्कुराकर अंकल को ऐसे देख रहा था जैसे
उत्तर दे रहा हो कि 'उसे सीट की जरूरत ही ना थी लेकिन
बूढ़ी अम्मा को जरूरत थी सीट की भी और टिकट की भी व्यवस्था  करि रहे हैं"
खैर ...
  लगभग आधे घंटे बाद अम्मा का गंतव्य आ गया .
      बूढ़ी अम्मा सीट से उठीं तो लड़के को थोड़ा झुकने का इशारा किया,, लड़का झुका तो अम्मा ने माथे को चूमते हुए कहा,, 'खूब खुस रहौ लल्ला , जुग जुग जीओ, हिंयैं रहित हैं हम,  हमार घर आइ गवा".  लड़के ने बूढ़ी अम्मा का झोला उठाया और उन्हे सहारा देकर बस से नीचे उतार कर वापस जब अपने सीट पर आया तब तक आधुनिका  को भी सीट मिल चुकी थी,  उसने लड़के को गागल्स के अंदर से देखते हुये हल्की सी स्माईल दी, और वह अंकल जी और जल भुन गये. लड़के ने स्माईल को और चौड़ा करते हुये उन्हे दिखा.
मै पीछे बैठा सारी घटनाओ को साक्षी भाव से देखते हुये संपूर्ण  घटनाक्रम  पर विचार कर रहा था कि दिखावे से ज्यादा जरूरी है ये महसूस करना कि जरूरत किसकी बड़ी है,, कई बार एक भिखारी जिसपर तरस खाकर हम पचास रुपए भी दे देते हैं वो पहले से जेब में पाँच हजार दबाए बैठा होता है
और ...
कई बार कोई अच्छे कपड़े पहना हुआ आदमी खाली जेब लिए परेशान घूम रहा होता है ...
भेड़चाल में चलते हुए नहीं बल्कि अपनी समझ से किसी की सहायता करना अधिक उपयुक्त है , जिसे भी जरूरत होगी वो अपनी जरूरत आपको बिना बोले महसूस करा लेगा ...
(बनारस, 03अगस्त2017, गुरूवार)
http://chitravansh.blogspot.in


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