सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

सन 2017 मे भारतीय स्टेट बैंक की आधुनिक सेवा और कम्प्यूटर पर सन 57 की मिसेज गुप्ता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 12 अक्टूबर 2017, शुक्रवार

सन 2017 मे भारतीय स्टेट बैंक की आधुनिक सेवा और कम्प्यूटर पर सन 57 की  मिसेज गुप्ता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 12 अक्टूबर 2017, शुक्रवार

                        जरूरी नहीं की पापों के प्रायश्चित के लिए दान पुण्य ही किया जाए । स्टेट बैंक में खाता खुलवा कर भी प्रायश्चित किया जा सकता है । छोटा मोटा पाप हो तो बैलेंस पता करने चले जाएँ ।
चार काउन्टर पर धक्के खाने के बात पता चलता है कि , बैलेंस गुप्ता मैडम बताएगी । गुप्ता मैडम का काउन्टर कौनसा है ये पता करने के लिए फिर किसी काउन्टर पर जाना पड़ता है ।
          लेवल वन कम्प्लीट हुआ । यानी गुप्ता मैडम का काउन्टर पता चल गया है । लेकिन अभी थोड़ा वैट करना पड़ेगा क्योंकि गुप्ता मैडम अभी सीट पर नहीं है ।
            आधे घंटे बाद चश्मा लगाए पल्लू संभालती हुई युनिनोर की 2g स्पीड से चलती हुई गुप्ता मैडम सीट पर आती है । आप मैडम को खाता नंबर देकर बैलेंस पूछते है ।
              गुप्ता मैडम पहले तो आपको इस तरह घूरती है जैसे आपने उसकी बेटी का हाथ मांग लिया है । आप अपना थोबड़ा ऐसे बना लेते है जैसे सुनामी में आपका सबकुछ उजड़ गया है और आज की तारिख में आपसे बड़ा लाचार दुखी कोई नहीं है ।
गुप्ता मैडम को आपके थोबड़े पर तरस आ जाता है और बैलेंस बताने जैसा भारी काम करने का मन बना लेती है । लेकिन इतना भारी काम अकेली अबला कैसे कर सकती है ? तो मैडम सहायता के लिए आवाज लगाती है -
- मिश्राजी ....ये बैलेंस कैसे पता करते है ?
मिश्राजी अबला की करुण पुकार सुनकर अपने ज्ञान का खजाना खोल देते है ।
- पहले तो खाते के अंदर जाकर क्लोजिंग बैलेंस पर क्लिक करने पर बैलेंस आ जाता था । लेकिन अभी सिस्टम चैंज हो गया है ...अभी आप f5 दबाएँ और इंटर मारदे तो बैलेंस दिखा देगा ।
गुप्ता मैडम चश्मा ठीक करती है , तीन बार मोनिटर की तरफ और तीन बार की - बोर्ड की तरफ नजर मारती है । फिर उंगलियाँ की - बोर्ड पर ऐसे फिरातीं है जैसे कोई तीसरी क्लास का लड़का वर्ल्ड मैप में सबसे छोटा देश मस्कट ढूंढ रहा हो । मैडम फिर मिश्रा जी को मदद के लिए पुकारती है -
- मिश्रा जी , ये f5 किधर है ?
मैडम की उम्र पचास से ऊपर होने के कारण शायद मिश्राजी पास आकर मदद करने की जहमत नहीं उठाते । इसलिए वहीँ बैठे बैठे जोर से बोलते है -
- की बोर्ड में सबसे ऊपर देखिये मैडम ।
- लेकिन सबसे ऊपर तो तीन बतियां जल रही है ।
- हां उन बतियों से नीचे है ...लम्बी लाईन है f1 से लेकर f12 तक ।
फायनली मैडम को f5 मिल जाता है । मैडम झट से बटन दबा देती है । मोनिटर पर आधे घंटे जलघड़ी ( कुछ लोग उसे डमरू समझते है ) बनी रहती है । अंत में एक मैसेज आता है -
Session expired. Please check your connection.
मैडम अपने हथियार डाल देती है । एक नजर आपके गरीबी लाचारी से पुते चेहरे पर डालती है और कहती है -
- सॉरी .....सर्वर में प्रोब्लम है ।
कहने का टोन ठीक वैसा ही होता है जैसे पुरानी फिल्मो में डोक्टर ओपरेशन थियेटर से बाहर आकर कहता था -
" सॉरी .....हमने बहुत कोशिश की पर ठाकुर साहब को नहीं बचा पाए "
(बनारस, 12 अक्टूबर 2017, शुक्रवार)
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बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

व्योमवार्ता, हिन्दुस्तान मे अब्दुल्ला परेशान है : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 11अक्टूबर 2017, बुधवार

अब तो इस मुल्क में दलितों और अल्पसंख्यको का जीना मुश्किल हो गया है,
इतना बड़बड़ाते हुए अब्दुल्ला...

1-- अपने 8वें बच्चे की डिलीवरी के लिए जिला अस्पताल के डॉक्टर से मिलने पहुँच गया !

2--और 6000 रु लेकर मोदी को गालियाँ देते हुए घर चला आया !

3-- उसकी तीसरी बेगम ने फ्री में मिले सिलेंडर को ऑन किया और गोश्त गरम किया, अब्दुल्ला ने खाया और बच्चों को भी  खिलाया और सुलाया !

4--फिर सुबह योगी को कोसते हुए ग्रामीण बैंक पहुँच गया और लोन माफी का सर्टिफिकेट प्राप्त किया !

5--फिर अपने सातों बच्चों को स्कूल से मिली free वाली नई  ड्रेस पहना कर स्कूल भेजा !
और बच्चों को समझाया देखो स्कूल में वंदे मातरम् और भारत माता की जय मत, ये बोलना इस्लाम में गुनाह होता है !

6-- फिर बच्चों को याद दिलाया कि अल्प संख्यक वजीफे वाला फार्म ज़रूर ले कर आना,
फीस तो खैर पहले से ही माफ है !

7-- स्कूल से आने के बाद बच्चों ने बकरियों के लिए हरे हरे पेड़ की पत्तियां तोड़ी,
कुछ पेड़ अब्दुल्ला काट कर पहले ही लकड़ी बेंच चुका है !

8-- ईद पर गली के चौराहे पर बकरे और गाय की कुर्बानी तो पिछले कई साल से दे ही रहा है,अब्दुला !

9--इधर रोहिंग्या मुसलमानो की स्थिति को लेकर अब्दुल्ला बहुत चिंतित रहता है !

10-- उधर चीन ने भी धोखा दे दिया, हिंदुस्तान पर हमला ही नही किया !

11-- पाकिस्तान की निंदा, वो भी चीन की धरती से...
ये बात बड़ी बुरी लगी अब्दुल्ला को !

12-- अब्दुल्ला कल मुफ्त शौचालय के बारे में पता करने जाएगा साथ ही मुफ्त मकान की भी जानकारी प्राप्त करेगा,
बिजली तो सालो से फ्री में जला ही रहा हैं वो...

*लेकिन एक बात जान लो...*
*अब्दुल्ला भारत में खुश नही है... !!*
(बनारस, 11अक्टूबर 2017, बुधवार)
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रविवार, 1 अक्तूबर 2017

विजय पर्व के पश्चात : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 01 अक्टूबर 2017, रविवार

विजय पर्व के पश्चात : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 01 अक्टूबर 2017, रविवार
आज जब नवरात्रि के व्रत के पश्चात व विजयादशमी के त्यौहार मना कर फुर्सत मे बैठा तो संपूर्ण रामकथा पर विचार करने लगा और ढेरो सवाल एक के बाद किन्तु परन्तुक रूप मे उठने लगे, चार दिन पूर्व दूरदर्शन लोकसभा पर रामकथा के प्रख्यात उपन्यासकार परम आदरणीय पद्मश्री डॉ0 नरेन्द्र कोहली जी ( हमारे गुरू जी) ने राम कथा के पात्रों के वर्तमान सरोकार व प्रासंगिकता पर बताते हुये कहा कि वृत्ति ही मानव को दानव बनाती है. वर्तमान परिस्थिति मे रामकथा पर विचार करते समय इन्ही प्रवृत्तियों पर मन मे ढेरो सवाल उठ रहे हैं.
राम से उदास जीवन किसका होगा? सीता से ज्यादा किसने सहा होगा? लक्ष्मण से ज्यादा समर्पण कौन करेगा ? दशरथ से ज्यादा कौन त्यागी  होगा ? कैकेयी से |ज्यादा क्रूरता किसने दिखाई होगी? हनुमान से ज्यादा भक्त कौन होगा?रावण से ज्यादा विद्वान शत्रु कौन होगा ?तु3लसीदास से ज्यादा बेहतर कविता कौन लिख सकेगा ?  रामचरितमानस और उसके सभी पात्र हमारे आदर्श हैं ,दुश्मनी करो तो रावण जैसे ,प्रेम करो तो सीता जैसे , धर्म निभाओ तो राम जैसे? त्याग करो तो दशरथ जैसे|
           तभी रामकथा की सार्थकता होगी.
(झूंसी, इलाहाबाद, 01 अक्टूबर,2017, रविवार)
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शनिवार, 23 सितंबर 2017

व्योमवार्ता : नही चाहिये ऐसी सरकार : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 23 सितंबर 2017, शनिवार

नही चाहिये ऐसी सरकार : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 23 सितंबर 2017, शनिवार

2014 मे मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने से पहले तक चारो तरफ खुशहाली थी। 

देश के किसान चार्टेड प्लेन से गर्मी की छुट्टिया बिताने स्विट्जरलैंड जाया करते थे।

समाज मैं इतना भाईचारा था की लोग दिन रात एक दूसरे को प्यार से पुचकारते हुए चलते थे l

सामाजिक सौहार्द उच्च स्तर​ का था , सारे लोग सेक्युलर थे , टोपी तिलक कोई दूर दूर तक नहीं जनता था l

आतंकवादी AK 47 का प्रयोग नहीं करते थे बल्कि अपनी देशविरोधी मांगे मनवाने के लिए अनशन किया करते थे।

देश मे विदेशी मुद्रा का भंडार इतना अधिक था की उस पैसे को रखने की जगह हमारे पास नहीं थी,
और हमारी सरकार सऊदी अरब और अमेरिका जैसे गरीब देशों को कर्ज दिया करती थी l

व्यापारी बहुत खुश था , उस पर कोई Tax नहीं लगता था l

देश की सारी सड़के 8 लेन की थी और 100 किमी से अधिक की दूरी लोग बुलेट ट्रैन से ही तय किया करते थे।

देश के हर घर में 24 घंटे बिजली आती थी।इन्वर्टर और जेनरेटर का नाम किसी को नहीं पता था।

देश के हर घर में RO के पानी की सप्लाई होती थी हर व्यक्ति के पास रोजगार था।

फिर एक दिन संघी लोगो ने EVM में गड़बड़ी कर, पूरे देश की मशीन सेट कर दी ,
सुना है ऐसा करने के लिए अमित शाह और मोदी ने मिस्टर इंडिया फिल्म में प्रयुक्त घड़ी का प्रयोग किया और इसलिए उनको कोई देख नहीं पाया।

इस प्रकार से देश की राजमाता और उनके राजवंश के इकलौते सुपुत्र के जन्मजात हक़ पर लात मर कर इन संघी लोगो ने सत्ता  हासिल की।

*देश की सत्ता एक गैर कुलीन  के हाथ आते ही सारे सुख वैभव नष्ट हो गये l

सड़को से अचानक 7-7 लेन गायब हो गए और बचे हुए 1 लेन मैं भी बड़े बड़े गड्ढे हो गए।

हजारों गांवों के बिजली के खंभे उखड़वा दिए गए। अब हर घर में 24 की जगह 4-5घंटे की सप्लाई होने लगी।

RO के पानी की सप्लाई रोक दी गई।

देश के किसान अचानक गरीब हो गए क्योंकि संघियो ने उनकी फसलों पर टिड्डियाँ  छोड़ दी थी।

देश के चार्टर्ड प्लेन अदृय्ष्य हो गए, जो बच गए वो मोदी ने अपने निजी प्रयोग मैं ले लिए।

इसके तुरंत बाद जनता के सारे पैसे स्विस अकाउंट मैं ट्रांसफर कर के उनको  भूखो मरने को मजबूर कर दिया गया ।*

*_हद तो तब हो गयी जब हमारे देश की सभ्य जनता से मोदी ने स्वछता की अपील की l

व्यापारियों पर अत्याचार का आलम ये की जो बेचारे 4-5 पुश्तों से एक पैसा टैक्स भरे बिना व्यापर कर रहे थे, उनको GST के नाम पर टैक्स देने को मजबूर कर दिया।

देश भर की योजनाओ को आधार कार्ड से जोड़कर करोड़ो रूपये की बचत की और जनता का बेईमानी कर खाने का बुनियादी हक़ भी छीन लिया गया।

तमाम सेक्युलर पत्रकार जो बेचारे किसी तरह गरीबी मैं सरकारी दारू और NGO के फण्ड पर अपना जीवन चला रहे थे ,
उनके धनस्रोत विदेशी NGO  बंद कर उनको भूखो मरने पर मजबूर कर दिया गया।_*

*ऐसी निर्दयी सरकार को पुनः चुने जाने का कोई हक़ नहीं l

मुझे मेरा पप्पू, लालू,ममता , और वही मनमोहन चाहिए , मुझे बापस वही लाखो करोड़ के घोटाले चाहिए।

नहीं चाहिए मुझे ऐसे संघी सरकार जो मेरे किसी भी प्रकार के चोरी करने के हक़ को नुक्सान पहुँचती हो।

  नहीं चाहिए बुलेट ट्रैन , उसकी पटरी पर शौच करने की सुविधा तक नहीं होती।

नहीं चाहिए हाइवेज जिन पर तेज गति से चलते हुए वाहन हमारे बच्चो को नुक्सान पंहुचा सके।

नहीं चाहिए ऐसी सरकार जो हमारे 32 -35 साल के नौजवानो को देश विरोधी नारे लगाने मात्र पर केस कर दे ।

नहीं चाहिए ऐसी सरकार जो आतंकवादीयों को पापीस्तान और म्यांमार में घुसकर  मारे,

नहीं चाहिए ऐसी सरकार जो कश्मीर के आतंकियों का लिस्ट बनाकर सफाया करवाएं।

नहीं चाहिए ऐसी सरकार जो हर गरीब महिलाओं को गैस का कनेक्शन दे।

नहीं चाहिए मुझे रेलवे स्टेशन पर ₹ 5/ltr में RO का पानी देने वाली सरकार मैं तो ₹20 वाली बोतल खरीदूंगा।*

_*नहीं चाहिए मोदी सरकार गो बैक। .. राजमाता एंड पप्पू कम  बैक। .. :*_
(बनारस, 23 सितंबर 2017, शनिवार)
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व्योमवार्ता : नही है जबाब मॉ के पास? : व्योमेश चित्रवंश ती डायरी,23 सितंबर 2016, शुक्रवार

नही है जबाब मॉ के पास: व्योमेश चित्रवंश की डायरी,23 सितंबर 2016,शुक्रवार

ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये हैं?
( एक कविता जो मुझे सोशल मीडिया से प्राप्त हुई है. जिसे पढने के बाद गला रूद्ध है,ऑखे बरबस ही डबडबा आई है. मन मे आक्रोश कि वीर जवानों के शहादत के बजाय ऐसी बोझिल मनस्थिति की कविताओं को हम कब तक पढ़ते रहेगें ?)
_______

ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये हैं?
माँ मेरा मन बात ये समझ ना पाये है,
ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये हैं?
पहले पापा मुन्ना मुन्ना कहते आते थे,
टॉफियाँ खिलोने साथ में भी लाते थे।
गोदी में उठा के खूब खिलखिलाते थे,
हाथ फेर सर पे प्यार भी जताते थे।
पर ना जाने आज क्यूँ वो चुप हो गए,
लगता है की खूब गहरी नींद सो गए।
नींद से पापा उठो मुन्ना बुलाये है,
ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये हैं?

फौजी अंकलों की भीड़ घर क्यूँ आई है,
पापा का सामान साथ में क्यूँ लाई है।
साथ में क्यूँ लाई है वो मेडलों के हार ,
आंख में आंसू क्यूँ सबके आते बार बार।
चाचा मामा दादा दादी चीखते है क्यूँ,
माँ मेरी बता वो सर को पीटते है क्यूँ।
गाँव क्यूँ शहीद पापा को बताये है,
ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये हैं?

माँ तू क्यों है इतना रोती ये बता मुझे,
होश क्यूँ हर पल है खोती ये बता मुझे।
माथे का सिन्दूर क्यूँ है दादी पोछती,
लाल चूड़ी हाथ में क्यूँ बुआ तोड़ती।
काले मोतियों की माला क्यूँ उतारी है,
क्या तुझे माँ हो गया समझना भारी है।
माँ तेरा ये रूप मुझे ना सुहाये है,
ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये है।
पापा कहाँ है जा रहे अब ये बताओ माँ,
चुपचाप से आंसू बहा के यूँ सताओ ना।
क्यूँ उनको सब उठा रहे हाथो को बांधकर,
जय हिन्द बोलते है क्यूँ कन्धों पे लादकर।
दादी खड़ी है क्यूँ भला आँचल को भींचकर,
आंसू क्यूँ बहे जा रहे है आँख मींचकर।
पापा की राह में क्यूँ फूल ये सजाये है,
ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये हैं?

क्यूँ लकड़ियों के बीच में पापा लिटाये है,
सब कह रहे है लेने उनको राम आये है।
पापा ये दादा कह रहे तुमको जलाऊँ मैं,
बोलो भला इस आग को कैसे लगाऊं मैं।
इस आग में समा के साथ छोड़ जाओगे,
आँखों में आंसू होंगे बहुत याद आओगे।
अब आया समझ माँ ने क्यूँ आँसू बहाये थे,
ओढ़ के तिरंगा पापा घर क्यूँ आये थे ?
(बनारस,23 सितंबर 2016, शुक्रवार)
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सोमवार, 18 सितंबर 2017

आखिर ये विग्यापन क्या संदेश देना चाहता है : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17 सितंबर 2017, रविवार

आखिर ये विग्यापन क्या संदेश देना चाहता है : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17 सितंबर 2017, रविवार

                अभी पिछले कुछ दिनों से टी वी के सभी चैंनलों पर Axis bank के होम फाइनेंस का विज्ञापन दिखाया जा रहा है।जिसमे एक कार में माँ बेटा बैठे हुए आपस मे बात कर रहे है, जिसमे माँ बेटे से उसकी शादी के पहले ही अलग मकान लेने कह रही है, बेटा वजह पूछता है तो माँ कहती है कि बहु आएगी तो उसे एडजस्ट करने में दिक्कत होगी, टोका टोकी होगी, इससे अच्छा तुम अभी से नया घर ले लो । और वह आज्ञाकारी बेटा तुरंत माँ की बात मान लेता है ।
           अब प्रश्न ये है कि यह विज्ञापन क्या संदेश दे रहा है समाज को ? ऐसे विज्ञापनों के द्वारा हमारे भारतीय संस्कृति और मूल्यों पर करारी चोट की जा रही है। हर माँ बाप का सपना होता है कि बेटा जब बड़ा होगा तब शादी करके बहु को घर मे लाएंगे, बहुरानी का स्वागत करेंगे, समयानुसार जब नाती पोते होंगे तो उनकी खिलखिलाहट से घर गूंजेगा । दादा दादी की पदवी मिलेगी । पर इस विज्ञापन के धूर्त संदेश से युवाओं को माँ बाप से दूर करने की शिक्षा दी जा रही है ।
       लानत है ऐसे बैंक और उन एडवरटाइजिंग एजेंसी पर जो हमारे पारिवारिक संस्कारों और मूल्यों पर चोट कर रहे है । इन्हें तुरंत बंद करना चाहिए।
(बनारस,17 सितंबर 2017, रविवार)
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रविवार, 10 सितंबर 2017

व्योमवार्ता :अफशोस है कि सेकूलर मीडिया में तुम खबर होने लायक नहीं हो मयूरग्राम :व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 09 सितंबर 2017, शनिवार

व्योमवार्ता : मयूरग्राम,अफशोस है कि सेकूलर मीडिया में तुम खबर होने लायक नहीं हो
व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 09 सितंबर 2017, शनिवार

          मयूरग्राम का नाम सुना है, नही न? क्योंकि मीडिया में मयूरग्राम के लिये न तो जगह है न चर्चा के लिये जरूरत. क्योंकि मयूरग्राम सेकूलर है या यूँ कहिये कि सेकूलर मीडिया ने उसे अपने लिहाज से उसे सेकूलरों के रहमो करम पर छेड़ दिया है.
       पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से 240 किलोमीटर उत्तर बीरभूम जिले में  मुर्शिदाबाद से सटे नलहाटी के पास मयूरग्राम नाम का एक गांव होता था हाल-फिलहाल तक। 1990 के दशक में यहां 280 हिंदू परिवार और सिर्फ 15 मुस्लिम परिवार थे। सारे मुस्लिम परिवार भूमिहीन थे और बंटाई पर खेती करते थे। इसके बाद इन्होंने अपने बांग्लादेशी रिश्तेदारों को बुलाया और पंचायती व ग्रामसमाज की जमीन पर उनकी झोपड़ियां डलवा दी। 1998 तक गांव में 50 मुस्लिम परिवार हो गए और हालात बदलने लगे। अगले दो-चार साल में संख्या और बढ़ी और उससे ज्यादा तेजी से हिंदू महिलाओं का उत्पीड़न। घर से निकलते ही छेड़छाड़ शुरू हो जाती। कुछेक के साथ बलात्कार की कोशिश भी हुई। थाने में शिकायत करने का कोई नतीजा नहीं निकलता कभी। इसके बाद मुसलमानों ने पूजा पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों का भी विरोध शुरू कर दिया। गांव के काली मंदिर के सामने मस्जिद बन गई। मुसलमानों के आपत्ति जताने पर पुलिस ने मंदिर में शंख और ढोल बजाने पर पाबंदी भी लगा दी। उनकी अजान तो खैर चलती ही रही। इसके बाद उन्होंने हिंदुओं के साथ रोजाना गालीगलौज व उन्हें धमकाना शुरू कर दिया। महिलाओं का घर से बाहर कदम रखना दुश्वार हो गया। फिर दुर्गा पूजा बंद करा दी गई और ईद-बकरीद के दिन काली मंदिर के ऐन सामने मस्जिद में गायें कटने लगीं।

1990 के शुरू में जिस गांव में 280 हिंदू परिवार होते थे, 2016 आते-आते सिर्फ 10 शेष बचे। फिर मयूरग्राम थोड़ा सा हिंदू नाम लगा तो उसे भी बदल दिया गया। सरकार ने तेजी से कार्रवाई करते हुए मुसलमानों की मांग पर इसे मोरग्राम कर दिया। गांव के रेलवे स्टेशन का भी नाम अब मोरग्राम है। यह कहानी अकेले मयूरग्राम की नहीं बल्कि बांग्लादेश की सीमा से सटे बहुत से गांवों की है। असम की बराक वैली के सिलचर और करीमगंज जिलों में स्थिति और बदतर है।

यह दिखाता है कि बिना मारकाट किए लो-लेवल की संगठित और सतत हिंसा के क्या फायदे हो सकते हैं। यह तोप-तलवार से ज्यादा प्रभावी है, पीड़ित यह सोचकर ही थाने नहीं जाता कि ये तो रोज ही होना है। और वहां सुनवाई न होने पर एक असहाय शहरी के सामने समर्पण या फिर पलायन के अलावा कोई रास्ता शेष नहीं रहता। ज्यादातर पलायन का विकल्प चुनते हैं।

बंगाल-असम में जो हिंदुओं के साथ हो रहा है, ठीक वहीं यूरोप में यहूदियों के साथ हो रहा है। स्थिति इतनी विकट है कि प्रतिष्ठित पत्रिका "द अटलांटिक" ने अप्रैल 2015 के अंक में कवर स्टोरी छापी , " Is it time for jews to leave Europe"। इस पत्रिका के मुताबिक फ्रांस में सिर्फ एक प्रतिशत यहूदी हैं पर मजहबी/नस्ली हिंसा के 51 प्रतिशत मामलों में शिकार वही होते हैं। स्वीडन में स्थिति और भयावह है। वहां अगर आप यहूदी पहचान के साथ सड़क पर निकले तो मार खाना तय है। ज्यादातर यहूदी अब इजराइल भाग रहे हैं।

यह अलग मामला है कि यहूदियों के खिलाफ हिंसा के ज्यादातर मामले अनरिपोर्टेड ही रह जाते हैं। मीडिया में ये खबर नहीं बनते। इसकी वजह है? एक तो यह कि अल्पसंख्यकों में भी अल्पसंख्यक होने के बावजूद साक्षर व समृद्ध यहूदी समाज की मुख्य धारा में हैं। यह उनका अपराध है। मुस्लिम अप्रवासी, अश्वेत और एलजीबीटी जैसे कुछ तबके सौभाग्यशाली हैं जो लिबरल-लेफ्ट लिबरल समुदाय की ओर से सत्यापित व सूचीबद्ध उत्पीड़ित तबकों में आते हैं। ये सरकार व मीड़िया की ओर से पीड़ित व संरक्षित घोषित किए जा चुके हैं। इनका बाल भी बांका हुआ तो तत्काल संज्ञान लिया जाएगा। मीडिया क्या करे? हमें तो पहले दिन ही सिखाया गया कि कुत्ता आदमी को काटे तो खबर नहीं होती पर आदमी कुत्ते को काट ले तो खबर है। जिसने भी यह थ्योरी दी वह पक्का लिबटार्ड रहा होगा। अब इसका नतीजा देख लें। कुत्ते आपके घर व मुहल्ले में कितनों को भी काट लें, पर आपकी खबर, खबर होने के लायक नहीं। पलायन चाहे मयूरग्राम से हो चाहे मालमो से, सामान्य घटना है। लेकिन अगर आपका नाम अखलाक या जुनेद है तो निश्चिंत रहें। आप सर्टिफाइड विक्टिम हैं, राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी आपके साथ होगी।
(बनारस, 9 सितंबर 2017, शनिवार)
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रविवार, 3 सितंबर 2017

सावन के बरसात मे स्नेह के रिश्ते का विसर्जन : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,29 अगस्त 2017

सावन के बरसात मे स्नेह के रिश्ते का विसर्जन : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,29 अगस्त 2017

          सावनका महीना था. दोपहर के 3 बजे थे. रिमझिम शुरू होने से मौसम सुहावना पर बाजार सुनसान हो गया था. साइबर कैफे में काम करने वाले तीनों युवक चाय की चुसकियां लेते हुए इधरउधर की बातों में वक्त गुजार रहे थे. अंदर 1-2 कैबिनों में बच्चे वीडियो गेम खेलने में व्यस्त थे. 1-2 किशोर दोपहर की वीरानगी का लाभ उठा कर मनपसंद साइट खोल कर बैठे थे.  मै भी कैफे के एक क्यूबिक मे बैठा अपना मेल चेक करते हुये बरसात बंद होने का इंतजार कर रहाहूँ. तभी वहां एक महिला ने प्रवेश किया. युवक महिला को देख कर चौंके, क्योंकि शायद बहुत दिनों बाद एक महिला और वह भी दोपहर के समय, उन के कैफे पर आई थी. वे व्यस्त होने का नाटक करने लगे और तितरबितर हो गए.
महिला किसी संभ्रांत घराने की लग रही थी. चालढाल व वेशभूषा से पढ़ीलिखी भी दिख रही थी. छाता एक तरफ रख कर उस ने अपने बालों को जो वर्षा की बूंदों व तेज हवा से बिखर गए थे, कुछ ठीक किए. फिर काउंटर पर बैठे लड़के से बोली, ‘‘मुझे एक संदेश टाइप करवाना है. मैं खुद कर लेती पर हिंदी टाइपिंग नहीं आती है.’’
‘‘आप मुझे लिखवाएंगी या...’’
‘‘हां, मैं बोलती जाती हूं और तुम टाइप करते जाओ. कर पाओगे? शुद्ध वर्तनी का ज्ञान  है तुम्हें?’’
लड़का थोड़ा सकपका गया पर हिम्मत कर के बोला, ‘‘अवश्य कर लूंगा,’’ मना करने से उस के आत्मविश्वास को ठेस पहुंचने की आशंका थी.  महिला ने बोलना शुरू किया, ‘‘लिखो-
मेरे भैया,
शायद यह मेरी ओर से तुम्हारे लिए अंतिम राखी होगी, क्योंकि अब मुझ में इतना सब्र नहीं बचा है कि मैं भविष्य में भी ऐसा करती रहूंगी. नहीं तुम गलत समझ रहे हो. मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं है, क्योंकि शिकायत करने का हक तुम वर्षों पहले ही खत्म कर चुके हो.’’  इतना बोल कर महिला थोड़ी रुक गई. भावावेश से उस का चेहरा तमतमाने लगा था. उस ने कहा, ‘‘थोड़ा पानी मिलेगा?’’
लड़के ने कहा, ‘‘जरूर,’’ और फिर एक बोतल ला कर उस महिला को थमा दी. लड़के को बड़ी उत्सुकता थी कि महिला आगे क्या बोलेगी. उसे यह पत्र बड़ा रहस्यमयी लगने लगा था.  महिला ने थोड़ा पानी पीया, पसीना पोंछा और फिर लिखवाना शुरू किया, ‘‘कितना खुशहाल परिवार था हमारा. हम 5 भाईबहनों में तुम सब से बड़े थे और मां के लाड़ले तो शुरू से ही थे. तभी तो पापा की साधारण कमाई के बावजूद तुम्हें उच्च शिक्षा के लिए शहर भेज दिया था. पापा की इच्छा के विरुद्ध जा कर मां ने तुम्हारी इच्छा पूरी की थी. तुम भी वह बात भूले नहीं होंगे कि मां ने अपनी बात मनवाने के लिए
2 दिन खाना नहीं खाया था. जब तुम्हारा दाखिला मैडिकल कालेज में हुआ था तो मैं ने अपनी सारी सखियों को चिल्ला कर इस के बारे में बताया था और मुझे उन की ईर्ष्या का शिकार भी होना पड़ा था. एक ने तो चिढ़ कर यह भी कह दिया था कि तुम तो ऐसे खुश हो रही हो जैसे तुम्हारा ही दाखिला हुआ हो, जिस का उत्तर मैं ने दिया था कि मेरा हो या मेरे भैया का, क्या फर्क पड़ता है. है तो दोनों में एक ही खून. भैया क्या मैं ने गलत कहा था?  ‘‘फिर तुम होस्टल चले गए थे और जबजब आते थे, मैं और मां सपनों के सुनहरे संसार में खो जाती थीं. सपनों में मां देखती थीं कि तुम एक क्लीनिक में बैठे हो और तुम्हारे सामने मरीजों की लंबी लाइन लगी है. तुम 1-1 कर के सब को परामर्श देते और बदले में वे एक अच्छीखासी राशि तुम्हें देते. शाम तक रुपयों से दराज भर जाती. तुम सारे रुपए ले कर मां की झोली भर देते. तुम बातें ही ऐसी करते थे, मां सपने न देखतीं तो क्या करतीं?
‘‘और मैं देखती कि मैं सजीधजी बैठी हूं. एक बहुत ही उच्च घराने से सुंदर, सुशिक्षित वर मुझे ब्याहने आया है. तुम अपने हाथों से मेरी डोली सजा रहे हो और विदाई के वक्त फूटफूट कर रो रहे हो.
‘‘पिताजी हमें अकसर सपनों से जगाने की कोशिश करते रहते थे पर हम मांबेटी नींद से उठ कर आंखें खोलना ही नहीं चाहती थीं, क्योंकि तुम अपनी मीठीमीठी बातों से ठंडी हवा के झोंके जो देते रहते थे.
‘‘मां ने साथसाथ तुम्हारी शादी के सपने देखने भी शुरू कर दिए थे. उन्हें एक सुंदरसजीली दुलहन, आंखों में लाज लिए, घर के आंगन में प्रवेश करते हुए नजर आती थी. मां का पद ऊंचा उठ कर सास का हो जाता था और घर उपहारों से उफनता सा नजर आता था.
‘होस्टल से आतेजाते मां तुम्हें तरहतरह के पकवान बना कर खिलाती भी थीं और बांध कर भी देती थीं. पता नहीं ये सब करते समय मां में कहां से ताकत व हिम्मत आ जाती थी वरना तो सिरदर्द की शिकायत से पूरे घर को वश में किए रखती थीं.
‘‘सपने पूरे होने का समय आ गया था. तुम ने अपनी डिगरी हासिल कर ली थी और होस्टल छोड़ कर घर आने की तैयारी कर ही रहे थे कि अचानक तुम्हें एक प्रस्ताव मिला. प्रस्ताव एक सहपाठिन के पिता की ओर से था- विवाह का. तुम ने मां को बताया. मां को अपने सपने दूनी गति से पूरे होते नजर आने लगे. मां ने सहर्ष हामी भर दी. मैं आज तक नहीं समझ पाई कि मां ने स्वयं को इतनी खुशहाल कैसे समझ लिया था. इठलातीइतराती घरघर समाचार देने लगीं कि डाक्टर बहू आएगी हमारे घर.
‘‘तुम्हारा विवाह हो गया. अब सब को मेरे विवाह की चिंता सताने लगी थी. मां बहुत खुश थीं. उन्होंने जो थोड़ाबहुत गहने मेरे लिए बनवाए थे उन्हें दिखाते हुए तुम से कहा था कि बेटा इतना तो है मेरे पास, कुछ नकद भी है, तू कोई अच्छा वर तलाश कर बाकी इंतजाम भी हो जाएगा. अब तू यहां रहेगा तो क्या चिंता है. समाज में मानप्रतिष्ठा भी बढ़ेगी और आर्थिक समृद्धि भी आएगी.
‘‘सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन भाभी ने घोषणा कर दी कि अभी यहां क्लीनिक खोलने से लाभ नहीं है. इतना पैसा तो है नहीं आप लोगों के पास कि सारी मशीनें ला सकें. नौकरी करना ही ठीक रहेगा. मेरे पिताजी ने हम दोनों के लिए सरकारी नौकरी देख ली है, हमें वहीं जाना होगा.
‘‘और तुम चले गए थे. उस के बाद तुम जब भी आते तुम्हारे साथ भाभी की फरमाइशों व शिकायतों का पुलिंदा रहता था पर पापा की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे अब तुम्हारी सभी इच्छाएं पूरी कर पाते. उन्हें अन्य भाईबहनों की भी चिंता थी. भैया उन दिनों मैं ने तुम्हारे चेहरे पर परेशानी व विवशता दोनों का संगम देखा था. तुम्हारी मुसकराहट न जाने कहां गायब हो गई थी. हर वक्त तनाव व चिड़चिड़ाहट ने तुम्हारे चारों ओर घेरा बना लिया था. भाभी को मां गंवार, मैं बोझ और पापा तानाशाह नजर आने लगे थे. तुम ने बहुत कोशिश की कि मां कुछ ऐसा करती रहें कि भाभी संतुष्ट रहे, परंतु न मां में इतनी सामर्थ्य थी, न ही भाभी में सहनशक्ति. धीरेधीरे तुम भी हमें भाभी की निगाहों से देखने लगे थे. कुछ तुम्हारी मजबूरी थी, कुछ तुम्हारा स्वार्थ. एक दिन तुम ने मां से कहा कि मां, मुझे दोनों में से एक को चुनना होगा, आप सब या मेरा निजी जीवन.
‘‘मां ने इस में भी अपना ममत्व दिखाया और तुम्हें अपने बंधन से मुक्त कर के भाभी  के सुपुर्द कर दिया ताकि तुम्हारा वैवाहिक जीवन सुखमय बन सके.
‘‘उस दिन के बाद तुम यदाकदा घर तो आते थे पर एक मेहमान की तरह और अपनी खातिरदारी करवा कर लौट जाते थे. पापा ने मेरा रिश्ता तय कर दिया और शादी भी. इसे मेरा विश्वास कहो या नादानी अभी भी मुझे यही लगता था कि यदि तुम मेरे लिए वर ढूंढ़ते तो पापा से बेहतर होता और मैं कई दिनों तक तुम्हारा इंतजार करती भी रही थी. पर तुम नहीं आए. शादी के वक्त तुम थे परंतु सिर्फ विदा करने के लिए. सीधेसादे पापा ने अपने ही बलबूते पर सभी भाईबहनों का विवाह कर दिया. करते भी क्या. घर का बड़ा बेटा ही जब धोखा दे जाए, हिम्मत तो करनी ही पड़ती है.
‘‘मैं पराई हो गई थी. जब भी मैं मां से मिलने जाती मां की सूनी आंखों में तुम्हारे इंतजार के अलावा और कुछ नजर नहीं आता था. मां मुझ से कहतीं कि एक बार भैया को फोन मिला कर पूछ तो सही कैसा है, वह घर क्यों नहीं आता. कहो न उस से एक बार बस एक बार तो मिलने आए. तुम ने घर आना बिलकुल बंद कर दिया था. पापा पुरुष थे, उन्हें रोना शोभा नहीं देता था, परंतु मायूसी उन के चेहरे पर भी झलकती थी. मां के पास सब कुछ होते हुए भी जैसे कुछ नहीं था. तुम मां के लाड़ले जो चले गए थे मां से रूठ कर. पर मां को अपना दोष कभी समझ नहीं आया. वे अकसर मुझ से पूछतीं कि क्या मुझे उसे पढ़ने बाहर नहीं भेजना चाहिए था या मैं ने उस का यह रिश्ता कर के गलती की? अंत में यही परिणाम निकलता कि सारा दोष मध्यवर्गीय परिवार से संबंध रखना ही था. सिर्फ खर्चा और कुछ न मिलने की आस से ही यह हुआ था.
‘‘पापा ने आस छोड़ दी थी पर मां के दिल को कौन समझाता? पापा से छिपछिप कर अपनी टूटीफूटी भाषा में तुम्हें चिट्ठी लिख कर पड़ोसियों के हाथों डलवाती रहती थीं और उन की 5-6 चिट्ठियों का उत्तर भाभी की फटकार के रूप में आता था कि हमें परेशान मत करो, चैन से जीने दो.
‘‘मां का अंतिम समय आ गया था. पर तुम नहीं आए. तुम से मिलने की आस लिए मां दुनिया छोड़ कर चली गईं और किसी ने तुम्हें भी खबर कर दी. तुम आए तो सही पर अंतिम संस्कार के वक्त नहीं, क्योंकि शायद तुम्हें यह एहसास हो गया था कि अब मैं इस का हकदार नहीं हूं.
‘‘जीतेजी मां सदा तुम्हारा इंतजार करती रहीं और मरते वक्त भी तुम्हारा हिस्सा मुझ से बंधवा कर रखवा गई हैं, क्योंकि वे मां थीं और मैं ने भी उन्हें मना नहीं किया, क्योंकि मैं भी आखिर बहन हूं पर तुम न बेटे बन सके न भाई.
‘‘भैया, क्या इनसान स्वार्थवश इतना कमजोर हो जाता है कि हर रिश्ते  को बलि पर चढ़ा देता है? तुम ऐसे कब थे? यह कभी मत कहना ये सब भाभी की वजह से हुआ है, क्या तुम में इतना भी साहस नहीं था कि  अपनी इच्छा से एक कदम चल पाते? यदि  तुम्हारे जीवन में रिश्तों का बिलकुल ही महत्त्व नहीं है, तो मेरी राखी न मिलने पर विचलित क्यों हो जाते हो? और किसी न किसी के हाथों यह खबर भिजवा ही देते हो कि अब की बार राखी नहीं मिली.
‘‘भैया, क्या सिर्फ राखी भेजने या बांधने से ही रक्षाबंधन का पर्व सार्थक सिद्ध हो जाता है? क्या इस के लिए दायित्व निभाने जरूरी नहीं? आज 25 साल हो गए. इस बीच न तो तुम मुझ से मिलने ही आए और न ही मुझे बुलाया. इस बीच मेरे द्वारा भेजी गई राखी एक नाजुक सेतु की तरह थी जोकि अब टूटने की कगार पर है, क्योंकि अब मेरा विश्वास व इच्छाशक्ति दोनों ही खत्म हो गए हैं.
‘‘भैया, बस तुम मुझे एक बात बता दो कि यदि हम बहनें न होतीं तो क्या तुम मम्मीपापा को छोड़ कर नहीं जाते? क्या तुम्हारे पलायन का कारण हम बहनें थीं? हम तुम्हें कैसे विश्वास दिलातीं कि हम तुम से कभी कुछ अपेक्षा नहीं रखेंगी, तुम एक बार अपनी विवशता कहते तो सही. हो सके तो इस राखी को मेरी अंतिम निशानी समझ कर संभाल कर रख लेना, क्योंकि मेरे खयाल से तुम्हारे दिल में न सही, घर में इतनी जगह तो होगी.
भैया सच मानो आज इस सावन मे राखी भेजते समय  मै बार बार सोच कर इस निर्णय पर पहुँची हो कि तुम्हारे लिये भले ही ये रिश्ता शायद औपचारिकताओं से लिपटा दो धागे का हो पर मेरे लिये मेरे संस्कारों मे पिलायी गई घूंटी की तरह एक विश्वास का है कि मेरा भाई हर मुसीबत मे मेरी रक्षा करेगा, पर यह मेरा झूठा  विश्वास भी शायद तुम्हारे लिये बोझ न बन जाये इस लिये बहुत सोच समझ कर तुम्हे आज इस बोझ से मुक्त करती हूँ, शायद मै अपने हाथों से ये सारी बात तुम्हे नही लिख पाती पर सफेद कागज पर टाईप होते ये काले अक्षर मेरे मन के बोझ को इस बरसात मे बरसते हुये पानी की तरह अच्छी तरह महसूस करते है,इस बरसात मे मै तुम्हारे व खुद के इस बोझिल रक्षा बंधन के रिश्ते को विसर्जित कर रही हूँ .
तुम्हारी बहन
छोटी ’’
       चिट्ठी लिखवातेलिखवाते वह महिला उत्तेजना व भावनावश कांपने लगी, पर उस की आंखों से आंसू नहीं छलके. शायद वे सूख चुके थे, पर टाइप करने वाले लड़के की आंखें नम हो गई थीं.  काम पूरा हो गया था. उस महिला ने लड़के से कहा, ‘‘तुम इस की एक प्रतिलिपि निकाल कर मुझे दे दो ताकि मैं यह संदेश अपने भैया तक पहुंचा सकूं. मै जानती हूँ मेरा भैया ऐसा नही है बस उसमे आत्मविश्वास व आत्मनिर्णय की कमी है, वह आज भी मुझे बहुत चाहता है पर आज बड़े आदमी से और बड़े आदमी बनने की उसकी ईच्छा ने हम सब के साथ के रिश्तो को छोड़ दिया है.  25 वर्षों बाद मैं यह सब लिखने का साहस कर पाई हूं. मैं सदा छोटी बहन बन कर ही रही. पर आज इस रिश्ते का विसर्जन कर मै अपने भैया को इस झूठे दायित्व से मुक्त कर रही हूँ, साथ ही अपनी मॉ के पीड़ा व दु:ख को महसूस कर पा रही हूँ, रिश्तो का यह विसर्जन मेरी अपनी मां को मेरी अंतिम श्रद्धांजलि है जो दुखी और अपन् डाक्टर बेटे के प्रति अपने अगाध प्यार को अपने सीने में दबाए इस दुनिया से विदा हो गईं, उस से उन्हें कुछ राहत मिल सके.’’
         वह महिला जा चुकी है, बरसात भी बंद हो चुकी है पर साईबर कैफे के उस टाईपिस्ट लड़के की ऑखें लगातार ऑसू बरसा रही है. वह रिश्तो के अपनापन वाली मिठास को भौतिकता व स्वार्थ के खारे समुंदर मे विसर्जित होने इस पूरे घटनाक्रम का हिस्सा बना हुआ रिश्तो के गुणा गणित को समझने मे खुद केो असमर्थ पा रहा है. मोबाईल की घंटी बजते ही वह नाम देख के तुरंत ऑखों के ऑसू पोंछ  काल लेता है, " हॉ छोटी, मै राखी वाले दिन सुबह ही आ जाऊगॉ,....... हॉ रे पूरे दिन तेरे ‘ साथ रहूगॉ, फिल्म देखने चलेगें......हॉ,  तबियत ठीक है, ..... अरे नही आवाज भारी नही है, ....वो तो बस हल्का जुकाम हो गया था. ..... हॉ अभी भींग गया था न बारिस में...........हॉ, सब ठीक है, चल राखी को मिलते है, बाय..."
वो फिर अपने ऑसू पोंछता हुआ मोबाईल रखते हुये इधर उधर देखता है कि कोई उसको देख तो नही रहा.
         मै बगल के क्यूबिक मे बैठा अपना मेल चेक करता हुआ पूरा घटनाक्रम देख सुन के खुद को भी भौतिकवादी सोच, पैसे व रिश्तों के इस गणित को सोचने समझने का प्रयास कर रहा हूँ, मेरी ऊंगलियो गालो पर कुछ नमी का अहसास पा वहॉ तक चली जाती है, तब पता चलता है कि बगल वाले क्यूबिक मे हुये घटनाक्रम से मेरे ऑखों से भी बरसात होने लगी है. पर सच कहूँ दिल को देर तक नम कर देने वाली बरसात मन को कहीं न कहीं बहुत सुकून दे रही है.
(बनारस,29 अगस्त 2017, मंगलवार)
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