सोमवार, 21 अगस्त 2017

क्षमा शब्द, एक लघुकथा : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 21 अगस्त 2017, सोमवार

    
क्षमा शब्द, एक लघुकथा : व्योमेेश चित्रवंश की डायरी, 21 अगस्त 2017,सोमवार
   
एक साधक ने अपने दामाद को तीन लाख रूपये व्यापार के लिये दिये। उसका व्यापार बहुत अच्छा जम गया लेकिन उसने रूपये ससुरजी को नहीं लौटाये। आखिर दोनों में झगड़ा हो गया। झगड़ा इस सीमा तक बढ़ गया कि दोनों का एक दूसरे के यहाँ आना जाना बिल्कुल बंद हो गया। घृणा व द्वेष का आंतरिक संबंध अत्यंत गहरा हो गया। साधक हर समय हर संबंधी के सामने अपने दामाद की निंदा, निरादर व आलोचना करने लगे। उनकी साधना लड़खड़ाने लगी। भजन पूजन के समय भी उन्हें दामाद का चिंतन होने लगा। मानसिक व्यथा का प्रभाव तन पर भी पड़ने लगा। बेचैनी बढ़ गयी। समाधान नहीं मिल रहा था। आखिर वे एक संत के पास गये और अपनी व्यथा कह सुनायी।
संत श्री ने कहाः 'बेटा ! तू चिंता मत कर। ईश्वरकृपा से सब ठीक हो जायेगा। तुम कुछ फल व मिठाइयाँ लेकर दामाद के यहाँ जाना और मिलते ही उससे केवल इतना कहना, बेटा ! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे क्षमा कर दो।'
साधक ने कहाः "महाराज ! मैंने ही उसकी मदद की है और क्षमा भी मैं ही माँगू !"
संत श्री ने उत्तर दियाः "परिवार में ऐसा कोई भी संघर्ष नहीं हो सकता, जिसमें दोनों पक्षों की गलती न हो। चाहे एक पक्ष की भूल एक प्रतिशत हो दूसरे पक्ष की निन्यानवे प्रतिशत, पर भूल दोनों तरफ से होगी।"
साधक की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उसने कहाः "महाराज ! मुझसे क्या भूल हुई ?"
"बेटा ! तुमने मन ही मन अपने दामाद को बुरा समझा – यह है तुम्हारी भूल। तुमने उसकी निंदा, आलोचना व तिरस्कार किया – यह है तुम्हारी दूसरी भूल। क्रोध पूर्ण आँखों से उसके दोषों को देखा – यह है तुम्हारी तीसरी भूल। अपने कानों से उसकी निंदा सुनी – यह है तुम्हारी चौथी भूल। तुम्हारे हृदय में दामाद के प्रति क्रोध व घृणा है – यह है तुम्हारी आखिरी भूल। अपनी इन भूलों से तुमने अपने दामाद को दुःख दिया है। तुम्हारा दिया दुःख ही कई गुना हो तुम्हारे पास लौटा है। जाओ, अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगो। नहीं तो तुम न चैन से जी सकोगे, न चैन से मर सकोगे। क्षमा माँगना बहुत बड़ी साधना है।"
साधक की आँखें खुल गयीं। संत श्री को प्रणाम करके वे दामाद के घर पहुँचे। सब लोग भोजन की तैयारी में थे। उन्होंने दरवाजा खटखटाया। दरवाजा उनके दोहते ने खोला। सामने नाना जी को देखकर वह अवाक् सा रह गया और खुशी से झूमकर जोर जोर से चिल्लाने लगाः "मम्मी ! पापा !! देखो तो नाना जी आये हैं, नाना जी आये हैं....।"
माता पिता ने दरवाजे की तरफ देखा। सोचा, 'कहीं हम सपना तो नहीं देख रहे !' बेटी हर्ष से पुलकित हो उठी, 'अहा !पन्द्रह वर्ष के बाद आज पिता जी आये हैं।' प्रेम से गला रूँध गया, कुछ बोल न सकी। साधक ने फल व मिठाइयाँ टेबल पर रखीं और दोनों हाथ जोड़कर दामाद को कहाः "बेटा ! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे क्षमा करो।"
"क्षमा" शब्द निकलते ही उनके हृदय का प्रेम अश्रु बनकर बहने लगा। दामाद उनके चरणों में गिर गये और अपनी भूल के लिए रो-रोकर क्षमा याचना करने लगे। ससुरजी के प्रेमाश्रु दामाद की पीठ पर और दामाद के पश्चाताप व प्रेममिश्रित अश्रु ससुरजी के चरणों में गिरने लगे। पिता पुत्री से और पुत्री अपने वृद्ध पिता से क्षमा माँगने लगी। क्षमा व प्रेम का अथाह सागर फूट पड़ा। सब शांत, चुप ! सबकी आँखों सके अविरल अश्रुधारा बहने लगी। दामाद उठे और रूपये लाकर ससुर जी के सामने रख दिये। ससुरजी कहने लगेः "बेटा ! आज मैं इन कौड़ियों को लेने के लिए नहीं आया हूँ। मैं अपनी भूल मिटाने, अपनी साधना को सजीव बनाने और द्वेष का नाश करके प्रेम की गंगा बहाने आया हूँ।
मेरा आना सफल हो गया, मेरा दुःख मिट गया। अब मुझे आनंद का एहसास हो रहा है।"
दामाद ने कहाः "पिताजी ! जब तक आप ये रूपये नहीं लेंगे तब तक मेरे हृदय की तपन नहीं मिटेगी। कृपा करके आप ये रूपये ले लें।"
साधक ने दामाद से रूपये लिये और अपनी इच्छानुसार बेटी व नातियों में बाँट दिये। सब कार में बैठे, घर पहुँचे। पन्द्रह वर्ष बाद उस अर्धरात्रि में जब माँ-बेटी, भाई-बहन, ननद-भाभी व बालकों का मिलन हुआ तो ऐसा लग रहा था कि मानो साक्षात् प्रेम ही शरीर धारण किये वहाँ पहुँच गया हो। सारा परिवार प्रेम के अथाह सागर में मस्त हो रहा था। क्षमा माँगने के बाद उस साधक के दुःख, चिंता, तनाव, भय, निराशारूपी मानसिक रोग जड़ से ही मिट गये और साधना सजीव हो उठे।
(बनारस, 21 अगस्त 2017, सोमवार)
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सोमवार, 14 अगस्त 2017

व्योमवार्ता : प्रो0 परमानंद सिंह जी एक समाजवादी विचारक की विदाई : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 13 अगस्त 2017, रविवार

प्रो0 परमानंद सिंह का जाना,  एक समाजवादी चिन्तक की विदाई : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 13 अगस्त 2017, रविवार
रात के सवा नौ बज रहे हैं हम लोग काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर गंगा किनारे खड़े चिता की जलती लाल लपटों को देख रहे हैं चिता पर रखी परम आदरणीय प्रोफैसर परमानंद सिंह जी की पार्थिव शरीर जो आज संसार बंधनों से मुक्त होकर परम निद्रा में विलीन हो गई,  सुबह 9:00 बजे के आसपास आदरणीय वेद प्रकाश भैया का संदेश मिला की गुरुजी प्रो0 परमानंद जी नहीं रहे ,सुनकर एक धक्का सा लगा अभी पिछले हफ्ते ही तो मैं विचार कर रहा था उनके यहॉ जाने के लिये,  फोन किया घंटी बजती रही पर फोन नहीं उठा, लगा कि हो सकता है कहीं व्यस्त हो या शहर के बाहर हो. आज यह दु:खद जानकारी मिली कि एपेक्स अस्पताल में भर्ती गुरु जी के इस जीवन लीला का अंत हो गया . प्रो0 परमानंद सिंह जी से मेरा बहुत पुराना परिचय नहीं था , महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ  से कोई संबंध न होने के वजह से मै उनके व अध्यापन से भी परिचित नही था,  डॉ0 शंभुनाथ सिंह रिसर्च फाउण्डेशन मे आते जाते मै उन्हे देखता था वहीं से उनके महान व्यक्तितव व कृतित्व की जानकारी मिली, फाउंडेशन की कार्यकारिणी  मे आ जाने के पश्चात  भी परंतु उनके धीर-गंभीर व्यक्तित्व के आगे कभी खुद को उनके समक्ष प्रस्तुत करने का साहस नहीं कर सका पिछले साल जून में वेद प्रकाश भैया का फोन मिला की प्रो0 परमानंद सिंह जी से मिल लो कुछ उनका व्यक्तिगत कार्य है . वेदप्रकाश भैया दैनिक जागरण के पूर्व उप संपादक रहे है और हम जैसे कितनो के लिये बड़े भाई समान संरक्षक,  जो डॉटते भी है और फिर साथ बैठ कर मित्र की भूमिका भी निभा देते हैं. वेद प्रकाश भैया का आदेश था तो मेरे लिये टालना असंभव था.  और 15- 16 जून 2016 के आसपास मैं बैजनत्था स्थित गुरुजी की आवास पर गया , गुरू जी स्वयं अस्वस्थ होने के बावजूद अपने अपार्टमेंट  के नीचे ही सड़क पर हमारा इंतजार  कर रहे थे. मेरे लिये उन के भव्यतम व्यक्तित्व  के लिये जो संबोधन  निकला वह 'सर' का था, बातें समझी और फिर दिनोदिन हम लोगों के संबंध प्रगाढ़ होते गए  और वे मेरे और सूर्यभान के लिये अंत तक सर ही रहे. उनसे मिलकर एक स्नेह ,एक आदर ,एक विचारधारा , एक उर्जा  व उनके अनुभवों की जो थाती प्राप्त होती थी वह अब कभी नहीं प्राप्तहो सकेगी , दुऱ्भाग्यत: जब मुझे सर का सानिध्य प्राप्त हुआ तब तक उनकी आवाज समाप्त हो चुकी थी गले के कैंसर के कारण उनका वोकल कार्ड निकाल कर उन्हें बोलने वाली मशीन लगाई गई थी जिसके माध्यम से हम उनसे बात करते थे कभी-कभी मैं सोचता था की इतने बड़े समाजवादी विचारक ,उर्जावान नेता , काशी विद्यापीठ छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष व अध्यापक संघ के पूर्व अध्यक्ष और अपने पीछे अनुकरण करने वालों की एक लंबी तादाद वाली शिष्य मंडली को निर्देशित करने वाले गुरुजी  बोलने के लिये कितना कष्ट व कितना असहज महसूस करते होंगे अगर सरस्वती के पुत्र से मां सरस्वती का माध्यम वाणी ही हर लिया जाए वाली स्थिति  मे उनकी विवसता को महसूस किया जा सकता है परंतु गुरु जी ने कभी इस बात की शिकायत नहीं किया. पिछले 1 वर्षों में पनपे हमारे अति आत्मीय संबंधो ने हमें एक दूसरे के बहुत करीब ला दिया था .प्रोफ़ेसर परमानंद सिंह जी भले इतिहास के अध्यापक थे परंतु साहित्य ,राजनीति और संस्कृति में भी उनकी गहरी पकड़ थी. हमारे जैसों के लिये तो वे बौद्ध इतिहास के  इनसाइक्लोपीडिया थे. पर यह उनके बेबाक विचारस्वतंत्रता ही थी कि वे विचारधारा, जाति, धर्म, परिवेश  व प्रभाव  के बंधन से मुक्त अपनी बातों को स्पष्ट  रूप से रखते थे. उत्र प्रदेश  विधानसभा चुनाव 2017के पूर्व एक दिन बैठे-बैठे प्रदेश की राजनीति पर चर्चा चलने लगी, गुरूजी ने बिना लाग लपेट के कहा कि बनारस की सारी सीटें भाजपा जीतेगी और इस बार मोदी उत्तर प्रदेश में 300 प्लस का अपना लक्ष्य प्राप्त करेंगे .मेरे साथ साथ उनके अपार्टमेंट  के ही पड़ोसी अनिल शर्मा जी भी बैठे थे साथी मेरे मित्र सूर्यभान भी थे ,हम लोगों ने भाजपाई होने के बावजूद सर से इत्तेफाक न रखते हुए कहा कि हमें लगता है कि बनारस में पांच सीटें भाजपा जीतेगी परंतु वह अपनी बात पर अड़े रहे और एक महीने बाद होने वाले चुनाव में उनकी बातों को सच भी कर दिखाया .यह थी उनकी राजनीतिक समझ, वह समाजवादी विचारक होने के बावजूद राजनीति के सत्य को बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वीकार करते थे .
आज सुबह-सुबह मिली खबर को राजीव भैया से शेयर किया तो यह जानकारी मिली की पहले गुरुजी के पार्थिव शरीर को उनके पैतृक घर गुरेहठा आजमगढ़ ले जाएंगे और वहां से वापस बनारस आ कर मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार होगा .  अद्यतन स्थिति जानने के लिये सर के नंबर वाले WhatsApp  अकाउंट पर देखा तो गुरुजी के बारे में शायद प्रज्ञा ने शेयर किया था  " चिरनिद्रा में विलिन ! अंतिम यात्रा की ओर प्रस्थान प्रातः ०८.०० बजे सुबह ". थोड़ी देर पहले तक सर को चिरनिद्रा मे और अभी जब चिता पर उन्हें लेटे अग्नि मे समर्पित  होते हुये देख रहा हूं तो सोच रहा हूं  कि हॉ,  यह निद्रा ही तो है पर इस चिर मे अंतर सिर्फ इतना ही तो है कि जहां से सर फिर कभी नहीं जागेगें, न ही वापस आएंग. मेरे साथ वेदप्रकाश भैया,  डा0 बेनी माधव, राजीव भैया, डा0 सीमान्त, सूर्यभान, अजय और ढेर सारे लोग श्रद्धावनत हो गुरू जी के पार्थिव काया को पवित्र अग्नि मे भस्मीभूत  होते देख रहे हैं. और मै भीड़ मे खड़े हो कर भी नम ऑखो से बरसात मे ऊफनाती हुई गंगा के लहरो पर उछलते जल प्रवाह मे वाराणसी के महान जीवन्त सामाजिक विचारक की स्मृतियॉ तलाशने की कोशिश कर रहा हूँ जो अपने साथ एक विचारधारा  ही नही बल्कि एक पीढ़ी की थाती समेटे विलीन हो रही है. आप बहुत याद आयेगें सर,  इस एक वर्ष  के ही सानिध्य मे आपसे बहुत कुछ सीखने को मिला और बहुत कुछ सीखना बाकी था पर.....
     मै घाट से वापस चलते समय आदतन मोबाईल का स्टेटस चेक करता हूँ , सर के व्हाट्स ऐप्प एकाउण्ट की प्रोफाईल फोटो बदल गयी है,  मूलगंध कुटी विहार सारनाथ के महाबोधि  मंदिर की ओर अग्रसर सधी हुई चाल मे जाते हुये हमारे परम आदरणीय सर प्रो0 परमानंद सिंह जी,  जैसे कह रहे हो "बुद्धम् शरणम् गच्छामि,  संघम् शरणम् गच्छामि,  धम्मं शरणम् गच्छामि."
मृत्यु से अमरत्व की ओर.......
(बनारस, 13  अगस्त 2017, रविवार)
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शनिवार, 12 अगस्त 2017

भारत वंदना : व्योमेश चित्रवंश की पुरानी डायरी के पन्ने

भारत वंदना : व्योमेश चित्रवंश की पुरानी डायरी के पन्ने , 12 अगस्त 2017,शनिवार

हे भारत तुझे प्रणाम, माँ भारत तुझे प्रणाम
तेरे चरणों का वंदन करते हम तेरे संतान ।
वो तुम ही हो भारत भूमि,जहाँ संस्कृति का निर्माण हुआ
गीता का उपदेश हुआ, भारत का संग्राम हुआ
रामायण युग धर्म हुआ ,सभ्यता का संचार हुआ
जब जब तुझ पे संकटआया , अवतार लिए भगवान।
तुम ही वो जननी हो माँ जो वीरो को जनती है
तेरी संताने तुझ पे माँ सर्वस्व निछावर करती है
राणा, शिवा, आजाद, भगत जैसे कितने वीर हुए
गाँधी, नेहरू, शास्त्री, सुभाष ने किया स्वयं बलिदान।
तेरी शांत प्रकृति के बेटे ,माँ हम शान्ति दूत कहलाते है
पर उठे कोई ऊँगली तुझ पर ,हम कालदूत बन जाते है
रंगभेद मिटला कर हम , विश्वबंधु कहलाये है
तेरी धरती पे जन्म लिए ,हमको है अभिमान।
कश्मीर से कन्याकुमारी, तुम एक अखंड मूर्ति हो माँ
भारत के हर जन जन के मन में बसी छवि हो माँ
तुझ पे गर कोई हाथ उठा, वो हाथ वहीं कट जाएगा
तेरी खातिर दे देंगे हम कोटि कोटि जन प्राण.
(गणतंत्र दिवस विशेषांक, दैनिक आज , २६ जनवरी १९८८, वाराणसी के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित मेरी पहली कविता)
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मंगलवार, 8 अगस्त 2017

संवेदनहीन समाज के लिये शर्मिंदा हूँ मै : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 08अगस्त 2017, मंगलवार

संवेदनहीन समाज के लिये शर्मिंदा हूँ मै : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 08अगस्त 2017, मंगलवार

               आज सुबह अखबार  मे एक खबर पढ़ी,  तब से खींझ आ रही है कभी खुद पर, कभी समाज पर,  कभी आज के इस भौतिकवादी वातावरण पर. दु:ख इस बात का है कि मै इस पूरे प्रकरण पर दुखी हो कर खीझने के अलावा कुछ कर भी नही सकता हूँ सिवाय इसके कि मै भी अखबार  पढ़ना छोड़  दूँ,  मेरे पड़ोसी इंजीनियर चाचाजी प्राय: मुझसे कहते है " वकील साहब,  सुबह सुबह अखबार  पढ़ने के बजाय मेरे साथ ब्रह्मकुमारी आश्रम  चल कर पुरूषार्थ  किया किजीये,  अखबार  पढ़ने से नकारात्मकता आती है", पर मै सोचता हूँ कि यह तो तूफान आने पर शुतुरमुर्ग  की तरह रेत मे सिर गाड़ कर तूफान के अस्तित्व  को भूलाने की बातें होगी,  क्योंकि हम इस समाज का हिस्सा है और समाज के अच्छे बुरे के लिये हमारी भी जिम्मेदारियॉ है, पर  एलपीजी लिबराईजेशन, प्राईवेटाईजेशन, ग्लोबनाईजेशन (उदारीकरण, निजीकरण व वैश्विकरण) के सरकारी नीति के चलते जल्दी से जल्दी पैसा कमाने और सारे सुखसुविधाओ को भोगने के प्रवृत्ति ने पिछले ढाई  दशक से  हमारे भारतीय जीवन पद्धति का ताना बाना ही छिन्न भिन्न कर दिया है, पैसों व सुखसुविधाओं से बने इस नव प्रगाढ़  रिश्ते ने खून के रिश्तों को बहुत पीछे छोड़ दिया है. मै सोचता हूँ कि रिश्तो को सौदे के तराजू पर नफा नुकसान देख कर तौलने वाली इस भौतिकवादी  पीढ़ी के आने वाले समय व आने वाली पीढ़ी के बारे मे सोचते ही अंधकूप सा घना तिमिर दिखता है जहॉ दूर दूर तक सूरज के किरणों की कोई ऊम्मीद नही.
                 आज की खबर मुझे अभी तक  विचलित कर रही है, क्योंकि मेरे लिये यह सिर्फ  एक  बुज़ुर्ग की नहीं, पूरे समाज की मौत है! मुम्बई से जुड़ी एक ख़बर आज शायद आप ने भी पढ़ा होगा,  टीवी चैनल्स पर भी उससे जुड़ी एक-आध रिपोर्ट भी देखा होगा.  एक युवा डेढ़ साल बाद जब अमेरिका से घर लौटा तो देखा कि उसका फ्लैट अंदर से बंद है। उसकी मां उस घर में अकेली रह रहीं थी। जब बार-बार घंटी बजाने पर भी दरवाज़ा नहीं खोला, तो दरवाज़ा तोड़कर वो अंदर घुसा। उसने देखा कि फ्लैट के अंदर उसकी मां की जगह उसका कंकाल पड़ा है। पिता की मौत चार साल पहले ही हो चुकी थी।
           आख़िरी बार डेढ़ साल पहले उसने मां से बात की तो उन्होंने कहा था कि वो अकेले नहीं रह सकतीं। वो बहुत डिप्रेशन में है। वो वृद्धाश्रम चली जाएगी। बावजूद इसके बेटे पर इसका कोई असर नहीं हुआ। अप्रेल 2016 में फोन पर हुई उस आख़िरी बातचीत के बाद लड़के की कभी मां से बात नहीं हुई। तकरीबन डेढ़ साल बाद जब आज वो घर आया तो उसे मां की जगह उसका कंकाल मिला। पुलिस पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतज़ार कर रही है और तभी वो बता पाएगी कि महिला ने आत्महत्या की या उसकी हत्या हुई। मैंने इस ख़बर को एक नहीं, कई बार पढ़ा और बहुत सी ऐसी बातें हैं जो मेरे दिमाग में कौंध रही हैं।
              महिला ने जब डेढ़ साल पहले अपने बेटे को फोन पर कहा होगा कि बेटे मैं बहुत अकेली हूं। ये अकेलापन मुझे खाए जा रहा है। मेरा दम घुट रहा है और बेटे ने यहां-वहां की कुछ बात कर फोन रख दिया उसके बाद क्या हुआ होगा?
          बेटे ने अगली बार मां को कॉल किया होगा। मां ने फोन नहीं उठाया, तो क्या बेटे को फिक्र नहीं हुई? क्या उसके मन में ये ख़्याल नहीं आया कि मां आख़िरी बात इतनी दुखी लग रही थी। अकेली भी है, उसे कुछ हो तो नहीं गया?
               एक बार ऐसा नहीं लगा, मगर दो दिन बाद फिर फोन किया, तब भी उन्होंने नहीं उठाया या फोन नहीं लगा, उसके बाद भी वो इत्मीनान से कैसे रहा?  क्या मुम्बई शहर में जिसका कि वो रहने वाला था, उसका एक भी ऐसा रिश्तेदार-दोस्त नहीं था जिसे वो कह सके कि पता करो क्या हुआ...मां से बात नहीं हो रही।
            इस महानगरीय रिहाईस मे उस सोसाइटी में जहां वो महिला इतने सालों से रह रही थी, वहां भी किसी ने डेढ़ साल तक उसके गायब होने को नोट नहीं किया। बेटे और सोसाइटी के अलावा पूरे शहर मे, पूरी रिश्तेदारी में एक भी ऐसा इंसान नहीं था जिसने उस महिला से सम्पर्क करने की कोशिश की हो और बात न होने पर वो घबराया हो।
                मैंने सुना है कि उत्तराखंड में कुछ साल पहले चारधाम यात्रा के दौरान आई बाढ़ में मारे गए लोगों के परिजन आज भी उन पहाड़ियों में अपने परिजनों के अवशेष ढूंढते हैं। उन्हें पता है कि वो ज़िंदा नहीं है। बस इस उम्मीद में वहां भटकते हैं कि शायद उनसे जुड़ी कोई निशानी मिल जाए। उनका कोई अवेशष मिल जाए और वो कायदे से उनका संस्कार कर पाएं। सिर्फ इसलिए ताकि वो अवशेष भी यूं ही कहीं लावारिस न पड़े रहें। इतने सालों बाद भी बहुत से ऐसे लोग सिर्फ इस उम्मीद में वहां भटक रहे हैं।
           मगर यहां एक बुज़ुर्ग औरत अपने घर में डेढ़ साल पहले मर गई। उसे किसी को ढूंढना भी नहीं था। वो उसी पते पर थी जहां उसे होना थी मगर फिर भी डेढ़ साल तक उसके मरने का किसी को पता नहीं लगा। उसे किसी ने ढूंढा नहीं। बगल में रहने वाले पड़ोसियों तक ने नहीं। जिन्हें वो दिन में एक-आध बार दिख भी जाती होंगी। दरवाज़ा बंद देखकर किसी ने सोचा भी नहीं कि क्या हुआ...वो महिला कहां गईं!
          यह वही मुंबई है जहॉ आज से ठीक 75 साल पहले अगस्तक्रॉति का जयघोष  हुआ था जब देश की आजादी के लिये बिना एक दूसरे को जाने हजारो हजार लोग देश के आजादी व ऐका के नाम पर एक दूसरे को बचाने के लिये हाथों मे हाथ थामे खड़े थे,  उसी मुंबई  मे एक आलीशान  सोसाईटी के एक फ्लैट  मे डेढ़ साल से एक बूढ़ी मरी पड़ कर कंकाल बन गई और पड़ोसी तक को खबर नही, या पड़ोसी ने खबर लेने की जरूरत ही नही समझी. महज 75 सालों मे आदमियत के रिश्ते मे कितना फर्क पैदा कर दिया है हमने?
              ये अहसास कि दुनिया में मेरा कोई नहीं है। किसी को मेरी ज़रूरत नहीं है। मैं कुछ भी होने की वजह नहीं हूं। इससे बड़ी बदनसीबी किसी भी इंसान के लिए और कुछ भी नहीं। और यहां तो बात एक मां की थी। वो मां जिसे गर्भावस्था में अगर डॉक्टर ये भी बता दे कि आप उस पॉजिशन में मत सोइएगा, वरना बच्चे को तकलीफ होगी, तो वो सारी रात करवट नहीं बदलती। मां बन जाने पर जिसके लिए बच्चे का अच्छे से रोटी खाना दुनिया की सबसे बड़ी खुशी होता है।
          अब्बास ताबिश एक मशहूर शेर है, एक मुद्दत से मेरी माँ नहीं सोई 'ताबिश' मैनें इक बार कहा था मुझे डर लगता है और एक मां ने जब कहा कि उसे डर लग रहा है, वो अकेले नहीं रह सकती, तो वो बेटा डेढ़ साल तक इतनी रातें सो कैसे गया। वो समाज, वो रिश्तेदार, वो सोसाइटी वाले...वो सब कैसे अपनी-अपनी ज़िंदगियों में इतने व्यस्त थे कि साल तक एक महिला का गायब होना ही नहीं जान पाए। फ्लैट में कंकाल ज़रूर बुज़ुर्ग औरत का मिला है मगर मौत शायद पूरे समाज की हुई है। और इसी समाज का हिस्सा होने पर मैं भी शर्मिंदा हूं।
(बनारस, 08अगस्त 2017,मंगलवार)
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सोमवार, 7 अगस्त 2017

बनारस, अजब मिजाज का गजब शहर, बाबा कालभैरो : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 07 अगस्त 2017, सोमवार

बनारस, अजब मिजाज का गजब शहर ,बाबा कालभैरो : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 07 अगस्त 2017, सोमवार
          हमारा बनारस भी गजब का शहर है, मार्क ट्वेन ने कहा था कि बनारस इतिहास से प्राचीन,  परम्पर से परे और काल के सीमा परिधि से बाहर है, "Benaras is older than history, older than tradition, older even than legend and looks twice as old as all of them put together."अभी तक बनारस की स्थापना  के  बारे मे इतिहासकार कोई समय नही निश्चित  बता पाये हैं. बनारस अड़बंगी महादेव भोले नाथ की नगरी है, तो यहॉ के मिथक व इतिहास  भी अजब गजब है,  इन मिथक कहानियों  के पीछे छिपे ऐतहासिक रहस्य  व प्रमाणिकता क्या है किसी को नही मालूम पर हम बनारस वाले अपने पूर्वजों द्वारा सहेजी गई परम्पराओं  का पालन पूरे आस्था व विश्वास  के साथ करते हैं.  कमाल तो यह है कि हमारे साथ हमारे देवी देवता भी इसी मे प्रसन्नता अनुभव करते हैं. ये परम्पराये औरों के लिये कहानियों  होगी परहमारे लिये हमारी आस्था हैं हमारा विश्वास  है हमारी श्रद्धा  है. हम इन परम्पराओं मे कोई छेड़छाड़  नही रकरते न ही करना ही चाहते हैं न करने देते है क्योंकि यही हमारे बनारसीपन के रग रग मे समाया है और यही हमारा मिजाज भी है. इसी मे हमारी मस्ती है, दुनिया जहॉ चूल्हे भाड़ मे जाये हमारे ठेगे (बनारसी पाठक अपने लिहाज से सही शब्द का प्रयोग करने के लिये स्वतंत्र  है) से. हमारी तो अपनी वाली चलेगी, इसी को बनारसी मे अड़ना कहते हैं,  और अपनी बातें पर अड़ने से ही बनारसी अड़ी शब्द प्रचलन मे आया. तो साहब आपको इन अड़ीयों पर बनारसी अड़ीबाज मिल जायेगें, मुँह मे पान घुलाये आसमान की ओर मुँह उठा कर बिना एक बूँद पान चुआये मोहल्ले की राजनीति से लेकर ट्रम्प, पुतिन, शिंजो व गिलपिंग के इण्टरनेशनल राजनीति की मॉ बहन एक कर अपने सांसद प्रधानमन्त्री  के पालिसी का पोलिटिकल पोस्टमार्टम  करते हुये. दम तोड़ती ट्रैफिक व्यवस्था, चिद्दी चिद्दी ऊधरा रह सड़के,   साल छ महीना पहले बनी हुई पर आज धरती मे समाती हुई सड़के, सीवर के पुनरूद्धार के नाम पर दसकों से शहर को तालतलैया बनायी गई जल निगम की अराजक व्यवस्था और नगर को नरक बनाता नरक निगम को गरियाते कोसते हुये, पर इन सब के बावजूद बनारसी होने पर गौरवान्वित. इनकी लाईफस्टाईल बस एक " चना चबैना गंगाजल जो पुरवै करतार,  काशी कबहुँ न छोड़िये विश्वनाथ दरबार "
               इसी बनारस में एक पुलिस स्टेशन ऐसा है, जहां ऑफिसर की कुर्सी पर बाबा काल भैरव विराजते हैं। अफसर बगल में कुर्सी लगाकर बैठते हैं। सालों से इस स्टेशन के निरीक्षण के लिए कोई IAS, IPS नहीं आया. क्योंकि मान्यता यह है कि इस थाने के कोतवाल साक्षात  बाबा कालभैरव है. वे स्वयं थाना क्षेत्र  की कानून व्यवस्था  देखते है तो इसलिए अपनी कुर्सी पर नहीं बैठते थानेदार.
           वाराणसी के विश्वेश्वरगंज स्थित कोतवाली पुलिस स्टेशन के प्रभारी राजेश सिंह ने बताया, ''ये परंपरा सालों से चली आ रही है। यहां कोई भी थानेदार जब पोस्टिंग होकर आया, तो वो अपनी कुर्सी पर नहीं बैठा। कोतवाल की कुर्सी पर हमेशा काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव विराजते हैं।''
- ''क्राइम कंट्रोल के साथ-साथ सामाजिक मेल-मिलाप, आने-जाने वालों पर बाबा खुद नजर बनाए रखते हैं। वो शहर के रक्षक हैं। इसीलिए इन्हें काशी का कोतवाल भी कहा जाता है। बाबा की पूजा के बाद ही यहां तैनात पुलिसकर्मी काम शुरू करता है।''
- ''ऐसा माना जाता है कि बाबा विश्वनाथ ने पूरी काशी नगरी का लेखा-जोखा का जिम्मा काल भैरव बाबा को सौंप रखा है। शहर में बिना काल भैरव की इजाजत के कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता। शहर की सुरक्षा के लिए थानेदार की कुर्सी पर बाबा काल भैरव को विराजा गया है।''
- कांस्टेबल सूर्यनाथ चंदेल ने बताया, ''मैं 18 साल से खुद इस थाने में तैनात हूं। मैंने अभी तक किसी भी थानेदार को अपनी कुर्सी पर बैठते नहीं देखा। बगल में चेयर लगाकर ही प्रभारी निरीक्षक बैठता है। हालांकि, इस परंपरा की शुरुआत कब और किसने की, ये कोई नहीं जानता। लेकिन माना जाता है कि अंग्रेजों के समय से ही ये परंपरा चली आ रही है।''
ऐसा है बाबा काल भैरव का महत्व
- साल 1715 में बाजीराव पेशवा ने काल भैरव मंदिर का जीर्णोद्वार करवाया था। वास्तुशास्त्र के अनुसार बना यह मंदिर आज तक वैसा ही है। बाबा काल भैरव मंदिर के महंत-पंडित नवीन गिरी ने बताया, हमेशा से एक खास परंपरा रही है। यहां आने वाला हर बड़ा प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी सबसे पहले बाबा के दर्शन कर उनका आशीर्वाद लेता है।
काल भैरव मंदिर में रोजाना 4 बार आरती होती है। रात की शयन आरती सबसे प्रमुख है। आरती से पहले बाबा को स्नान कराकर उनका श्रृंगार किया जाता है। मगर उस दौरान पुजारी के अलावा मंदिर के अंदर किसी को जाने की इजाजत नहीं होती। बाबा को सरसों का तेल चढ़ता है। एक अखंड दीप हमेशा जलता रहता है।
   मान्यत है कि ''ब्रह्मा ने पंचमुखी के एक मुख से शिव निंदा की थी। इससे नाराज कालभैरव ने ब्रह्मा का मुख ही अपने नाखून से काट दिया था। कालभैरव के नाखून में ब्रह्मा का मुख अंश चिपका रह गया, जो हट नहीं रही था।''
- ''भैरव ने परेशान होकर सारे लोको की यात्रा कर ली, लेकिन ब्रह्म हत्या से मुक्ति नहीं मिल सकी। तब भगवान विष्णु ने कालभैरव को काशी भेजा। काशी पहुंच कर उन्हें ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति मिली और उसके बाद वे यहीं स्थापित हो गए।''
(बनारस,07 अगस्त 2017, सोमवार)
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शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

जरूरत जिसको, सहयोग उसी को : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 03 अगस्त 2017, गुरूवार

  जरूरतजिसको सहयोग  उसी को : व्योमेेश चित्रवंश की डायरी, 03 अगस्त 2017, गुरूवार

          सिटी बस स्टाप पर रूकी, बस मे भीड़ तो नही थी पर कोई सीट खाली भी नही थी. स्टाप पर एक डिजाईनर टीशर्ट और आज के दौर के हिसाब से फैशन कही जाने वाली जगह जगह से फटी जीन्स पहन कर ऑखों पर गागल्स और कानों मे ईयरफोन चढ़ाये एक माडगर्ल बस मे चढ़ी. उसके चढ़ते ही बस मे डियोडरेन्ट के खूशबू का एक झोंका सा आ गया. बस के माहौल मे भी उस झोंके का असर होना ही था. माहौल पर असर बस दो चार मिनट मे ही दिखने लगा.
   "ऐ मिस्टर ...एक लेडीज खड़ी है और तुम इतने हट्टे कट्टे होकर आराम से बैठे हो,, बड़े ही शर्म की बात है,". 45 की उम्र में 50 के दिखने वाले ( शारीरिक रूप से ठीक - ठाक ) अंकल टाइप आदमी ने साईड वाली दूसरी सीट पर बैठे सारा दिन धूप में भाग दौड़ करने के बाद थके हुए 25-26 साल के लड़के को हूबहू 'आदेश' जैसा लग रहा 'आग्रह' किया .
.पर लड़के ने जरा भी रिस्पॉन्स ना दिया, एक तो वो बहुत थका हुआ भी था, दूसरा कुछ अंकल के ज्ञान को अनदेखा भी कर रहा था, आखिर में अंकल ने - सामने खड़ी आधुनिका लड़की के अधिकार के लिए ( मोबाइल में व्यस्त ) लड़के को जोर से हिलाया
और मोबाइल फोन को छीन लेने का उपक्रम किया 'सुनाई नहीं देता है तुझे ? कह रहा हूँ लेडीज है, बैठने दो उनको ... ..".
      और इसी सब चक्कर में लड़के का मोबाइल हाथ से छूटकर नीचे जा गिरा . एक तो लड़के की खुद की भी कुछ समस्याएँ हो सकती हैं .ऊपर से अंकल की बकलोली, आखिर  खून हर समय इतना सहिष्णु थोड़े ही हो सकता है.
     अब लड़का बिगड़ पड़ा ... 'तुम वकील हो इसके ,, हाँ ?? तब से चेपो चेपो करे जा रहे हो ,, मैं साला तुम्हारी उम्र का लिहाज कर के बोल नहीं रहा कुछ तो तुम सर पर चढ़ जाओगे ???
और काहे दूँ मैं सीट अपना किसी को ? टिकट मैं नहीं लिया हूँ क्या ?? या कि तुम्हारी तरह स्टाफ कहकर फ्री में चढ़ा हूँ ??  ये लड़की अपाहिज है या उसको चक्कर आ रहा है जो सीट छोड़ दूँ ?
साला रोज नारी सशक्तिकरण का नया नारा ले कर जलूस पर जलूस निकलता जा रहा है और तुम हो कि कहते हो लड़की है कमजोर है,,सीट छोड़ दो ... और इतना ही तुमको दिक्कत है तो साला ...तुम छोड़ दो ना सीट ,,, या इतना भैंसा जैसा शरीर लेकर अचार डालोगे इसका ?और ये बताओ इतना नारीवादी काहे हुए जा रहे हो ??अब मुझे टोके तो साला सारा नारीवाद मैं घुसा दूँगा यहीं पर' ..."
   लड़के का रौद्र रूप देख अंकल एक कोने में दुबक कर बैठ गए ,
,
फिर वापस एक शब्द ना निकला उनके मुँह से .....
दो स्टाॅप के बाद बस रुकी ..!!
कुछ सवारियाँ उतरीं , कुछ नई चढ़ी ...
कंडक्टर के चिल्लाने की आवाज आई - " ऐ बुढ़ीयाँ चढ़ना है तो चढ़ो जल्दी ... इतना टाइम नहीं है हमारे पास' ..!
बस के गेट से एक बूढ़ी अम्मा चढ़ी जिनकी देह एकदम पसीने में भीगी थी, उम्र का असर उनके हाँफने में दिख रहा था, खुद का भार संभालना मुश्किल हो रहा था ऊपर से इतना बड़ा थैला भी उठाई थी वो ,,
उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं था सिवाय उस लड़के के ...
.
बस में गियर लगते ही झटका लगा जिसने बूढ़ी अम्मा को लगभग गिरा ही दिया था अगर वो लड़का झट से खड़ा हो कर उन्हें संभाल ना लेता...
संभालने के साथ ही लड़के ने उसे अपनी सीट बूढ़ी अम्मा को ये कहते दे दी 'यहाँ आराम से बैठो अम्मा,, और टिकट मत लेना मैं जा के ले लूँगा' ,,
     शायद अम्मा यही दुआ कर रही थी की कोई उसकी टिकट कटा कर देदे इसीलिए बिना दाँतों वाली प्यारी सी मुस्कुराहट बिखेरते बैठ गयीं .
सामने बैठे अंकल लड़के की तरफ गौर से देख रहे थे जैसे कह रहे हो 'हम कहे तो नहीं दिए ..और अब सीट भी दे दिए और टिकट भी कटा लिए बूढ़ी का"
     इधर से लड़का भी मुस्कुराकर अंकल को ऐसे देख रहा था जैसे
उत्तर दे रहा हो कि 'उसे सीट की जरूरत ही ना थी लेकिन
बूढ़ी अम्मा को जरूरत थी सीट की भी और टिकट की भी व्यवस्था  करि रहे हैं"
खैर ...
  लगभग आधे घंटे बाद अम्मा का गंतव्य आ गया .
      बूढ़ी अम्मा सीट से उठीं तो लड़के को थोड़ा झुकने का इशारा किया,, लड़का झुका तो अम्मा ने माथे को चूमते हुए कहा,, 'खूब खुस रहौ लल्ला , जुग जुग जीओ, हिंयैं रहित हैं हम,  हमार घर आइ गवा".  लड़के ने बूढ़ी अम्मा का झोला उठाया और उन्हे सहारा देकर बस से नीचे उतार कर वापस जब अपने सीट पर आया तब तक आधुनिका  को भी सीट मिल चुकी थी,  उसने लड़के को गागल्स के अंदर से देखते हुये हल्की सी स्माईल दी, और वह अंकल जी और जल भुन गये. लड़के ने स्माईल को और चौड़ा करते हुये उन्हे दिखा.
मै पीछे बैठा सारी घटनाओ को साक्षी भाव से देखते हुये संपूर्ण  घटनाक्रम  पर विचार कर रहा था कि दिखावे से ज्यादा जरूरी है ये महसूस करना कि जरूरत किसकी बड़ी है,, कई बार एक भिखारी जिसपर तरस खाकर हम पचास रुपए भी दे देते हैं वो पहले से जेब में पाँच हजार दबाए बैठा होता है
और ...
कई बार कोई अच्छे कपड़े पहना हुआ आदमी खाली जेब लिए परेशान घूम रहा होता है ...
भेड़चाल में चलते हुए नहीं बल्कि अपनी समझ से किसी की सहायता करना अधिक उपयुक्त है , जिसे भी जरूरत होगी वो अपनी जरूरत आपको बिना बोले महसूस करा लेगा ...
(बनारस, 03अगस्त2017, गुरूवार)
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बुधवार, 2 अगस्त 2017

मेरा प्रधानमंत्री, मेरा अभिमान : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 02 अगस्त 2017, मंगलवार

मेरा प्रधानमंत्री मेरा अभिमान : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 02 अगस्त 2017, मंगलवार)

एक व्यक्ति 350 सांसदों को लेकर आपके सामने आँशु बहाकर समर्थन माँग रहा और किस बात के लिये कालाधन खत्म करने के लिये??विश्व की तमाम राजधानी मे जाकर भारतवंशियों से सहायता माँग रहा??20 घँटे काम कर रहा , होली  दीपावली , ईद सैनिकों के बीच मना रहा हैं*
*3 सालो से हर रविवार आपकी छोटी - छोटी बातो पर बात कर रहा हैं" जिसकी माँ 8×10 कमरे और भाई किराना की दुकान चलता हो क्या चाहते हैं आप?? किस पैगम्बर की तलाश है??*

*एक बात जान लीजिये यदि मोदी आंतकवाद, काला धन , भरष्टाचार नही खत्म कर पाये तो कोई  माई का लाल कर भी नही पायेगा वहीँ जंतर मन्तर पर कैंडिल लेके चक्कर काटोगे,*

*प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे जीवट वाले व्यक्ति ने जिस अंदाज़ में सार्वजनिक मंच से कहा है....*
*कि "ये लोग मुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे..."*
*इससे यह स्पष्ट हो गया है कि स्थिति बहुत भयंकर और असहनीय रूप ले चुकी है..*

*एक अकेला व्यक्ति 125 करोड़ हिंदुस्तानियों के हिस्से का ज़हर "नीलकण्ठ" महादेव बनकर पी रहा है...*
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*एक अकेला व्यक्ति देश के अंदर मौजूद सारे राक्षसों के साथ-साथ अनगिनत विदेशी दुश्मनों (पाकिस्तान सरकार, पाकिस्तान की सेना, आई एस आई, दाऊद इब्राहिम, हाफिज सईद, चीन......) के निशाने पर है......*
*क्योंकि देश के इतिहास में पहली बार किसी अकेले आदमी ने इतने सारे दुश्मनों की एक साथ नींद हराम कर दी है...*

*ये अच्छाई और बुराई का महासंग्राम है, हमको तैयार रहना है और अपने प्रधान मंत्री का साथ देना है, क्योंकि अगर इन सभी राक्षसों ने प्रधान मंत्री को अगर अपने चक्रव्यूह में फंसा लिया तो फिर सदियों तक कोई दूसरा ऐसा नेता पैदा नहीं होगा...*

* मेरे प्रधानमंत्री जी मेरे देश के सम्मान है, वे मेरा अभिमान है, मुझे गर्व है मेरे देश पर, मेरे प्रधानमंत्री  पर.
मैं अपने प्रधानमंत्रीजी के साथ हूँ, क्या आप भी हैं ?
(बनारस, 02 अगस्त 2017,बुधवार)
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