गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

अपना बनारस स्मार्ट बनारस : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 06दिसंबर 2017 बुधवार

अपना बनारस स्मार्ट बनारस: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 06 दिसंबर 2017, बुधवार

        बनारस को स्मार्ट सिटी से लेकर क्योटो तक बनाने की तैयारियां पिछले तीन साल से चल रही हैं, पर इसी बीच यह शहर क्या बन गया है पता ही नहीं चल रहा ?
मेरी समझ से पिछले लगभग 4-5 वर्षों से जिस प्रकार यह शहर खोदा जा रहा है इसे क्योटो या स्मार्ट सिटी की जगह मोहनजोदड़ो बनाने की तैयारियां अंदर ही अंदर चल रही हैं.
शायद अमेरिका या अरब देशों ने भी किसी शहर के हर भाग को लगातार 4-5 वर्षों तक खुदवाया होता तो अब तक 4-6 तेल के कुयें और 1-2 सोने की खदानें मिल चुकी होतीं.
वैसे यह शहर स्मार्ट बन पाये या न बन पाये, इस शहर ने यहां के निवासियों को बेहद स्मार्ट बना दिया है. आप भी ध्यान देंगे तो समझ जायेंगे.
यहां की सड़कों पर कोई भी गाड़ी चलाना एक विश्वप्रसिद्ध कला बन चुका है और उसी गाड़ी को चलाते हुये सही सलामत घर तक पहुंच जाना तो ऐसा लगता है कि आपने सब कुछ जीत लिया. देखिये कैसे-
    आप आराम से चले जा रहे हैं. रास्ते में एक सांड़ बैठा हुआ है जैसे ही आप उसके पास पहुंचे वह खड़ा हो गया. अब उससे बचाते हुये गाड़ी काटकर निकालना स्मार्टनेस नहीं तो और क्या है. यदि सांड़ ने खड़े होने के साथ ही अंगड़ाई लेते हुये अपनी सींगे घुमा दीं तब तो बचना ओवर स्मार्टनेस है.
     अन्य शहरों की तरह यहां सीवर के ढक्कन सड़क के लेबल पर नहीं रखे जाते क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो आप स्मार्ट नहीं बन पायेंगे. ढक्कनों को सड़क के लेबल से 6 इंच ऊपर या नीचे रखा जाता है. इससे तेज चलते हुये एकाएक ब्रेक मारने तथा हैंडिल काटकर निकलने की कला आती है. कुछ लोग उसमें फंसकर या हैंडल काटते समय गिर जाते हैं पर ऐसे लोगों से मैं यही कहना चाहता हूं कि आप अभी इस शहर के लायक स्मार्ट नहीं बन पाये है.
  कभी कभी चलते समय एकाएक आपके अगल बगल, आगे पीछे, दाहिने या बांये की गाड़ी यदि गायब हो जाये तो आश्चर्यचकित होने की जगह तुरन्त अपनी गाड़ी रोककर गाड़ी समेत गड्ढे (जो सड़क धंस जाने अथवा किसी कंपनी या ठेकेदार के द्वारा किसी भी काम से खोदकर छोड़ दिये जाने के कारण बना है) में घुसे हुये व्यक्ति की सहायता कीजिये क्योंकि वह बेचारा आपके शहर की स्मार्टनेस की परीक्षा में फेल हो गया है.
   यहां की सड़कें भी आपकी परीक्षा के लिये ही बनायी जाती हैं. नई बनी सड़कों पर 10-15 तक रफ्तार से चलने के बाद एकाएक एक दिन आपको सड़क दिखनी बन्द हो जाती है. पता चलता है कि सड़क की 15 दिन की आयु पूरी हो गयी. अब अगर आप इन 15 दिनों में अपनी आदत खराब कर चुके हैं तो आपका महीन फैली हुयी गिट्टयों में फिसल कर गिरना पक्का है, और आप स्मार्टनेस की परीक्षा में फेल समझे जायेंगे.
   आप आराम से जा रहे हैं और आपको समय पर आफिस पहुंचने की चिन्ता लगी हुयी है, अचानक आपके आगे जा रहे एक निश्चिंत महोदय ने दाहिने गर्दन घुमाकर पान की पीक थूक दी. अब आगे वाली गाड़ी की गति से एक महीन लाल रंग का फव्वारा आपकी तरफ आयेगा. ध्यान रखिये कि इस फव्वारे से अपने आपको बचा लेना सबसे बड़ी कला है और स्मार्टनेस की परीक्षा का अंतिम चरण भी. यदि आपने अपने आपको बचा लिया तो आप स्मार्टनेस की परीक्षा में उत्तीर्ण हो चुके हैं और बेझिझक इस शहर में रहने के लायक है. यह शहर आपको अपना लेगा.
        मेरे कहने का मतलब केवल इतना है कि यह आवश्यक नहीं है कि शहर देखने में स्मार्ट लगे. हम बनारसी इस बात की लड़ाई लड़ेंगे कि जिस शहर में विश्व के सबसे अधिक स्मार्ट लोग रहते हों वह शहर अपने आप लिस्ट में आना चाहिये.                                                
           बनारस नगर निगम , पी.डब्लू.डी., राज्य सरकार, केंद्र सरकार एवं बनारस की जनता ,सभी को जरा गौर करना चाहिए।
(बनारस, 06 दिसंबर 2017,बुधवार)
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रविवार, 12 नवंबर 2017

BSNL लैण्डलाईन उपभोक्ता होने की व्यथा,: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 12 नवंबर 2017

बीएसएनएल लैण्डलाईन उपभोक्ता होने की व्यथा

           मेरे नाम बीएसएनएल का एक लैण्डलाईन है, महीने का न्यूनतम बिल 250+जीएसटी. अकसर वो खराब रहता है, तीज त्योहार बनाने वाले आते है,  दो लोग, त्योहारी के नाम पर 100-100रूपये ले जाते है, कभी कभी बनाने भी आते है, तो बनानाने आने के नाम पर 100-100रूपये ले जाते है.
यह क्रम चलता रहता है.   
                      पिछले दीवाली पर घर पर सिर्फ बच्चे थे, सो उन्होने त्योहारी नही दिया, तब से फोन खुद ही त्योहारी बना हुआ है,  हफ्ते मे 6 दिन खराब.
शिकायत आनलाईन करते ही तुरंत sms आता है आपकी शिकायत नं0 यह है, शिकायत फलां सज्जन को सौंप दी गई है, उनका मोबाइल नं0 फलॉ है, वगैरह वगैरह.  फिर एक दिन बाद sms आता है कि शिकायत दूर हो गई है.  कोई अन्य शिकायत होने पर फलॉ नं0 पर संपर्क  कर सकते है.
यह क्रम भी लगातार चलता रहता है.
मेरा फोन 0542-2290255 फिर खराब है,  शिकायत आनलाईन दर्ज हुई, आनलाईन ठीक भी हो गई. उसमे दिये हुये नंबर 9415795897 जो श्री राजाराम जी का है,  उस पर पिछले 4 दिनो से लगातार फोन कर रहा हूँ, घंटी बज रही है पर राजाराम जी को शायद सुनाई नही पड़ रही है.  ट्विटर पर मा0 मनोज सिन्हा जी से लेकर बीएसएनएल मुख्यालय व बीएसएनएल वाराणसी पर भी टि्वट किया पर जबाब वही,  फुरसत नही है टि्वट देखने की,  फिर क्यूँ टि्वटर एकाउंट  का एड्रेस दिया भाई.
   लोग बाग बताते है कि पिछली भाजपा सरकार मे भारतीय दूरसंचार  विभाग का तियॉ पॉच कर करके उसे नवरतन कंपनियों के लाईन से बहरिया कर सड़क पर खड़ा कर बीएसएनएल बनाया गया था,  अब अबकी बार बीएसएनएल को सरकारी नियंत्रण  से बहरिया कर किसी रूईया, अडानी, मित्तल, अंबानी को दे देने की योजना हो सकती है.
बहरहाल मुझे क्या मुझे तो अपने एक अदद मरे हुये टेलीफोन  के जीने का इंतजार है, उसे यह जीवनदान मनोज सिन्हा लगायत राजाराम तक कोई भी दे दे. पर लगता है
#BSNL nahi sudhrega.
(बनारस, 12नवंबर2017, रविवार)
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शनिवार, 4 नवंबर 2017

अच्छे दिन कब आयेगें???? : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 04 नवंबर 2017

अच्छे दिन कब आयेंगे ?????????? : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 04 नवंबर 2017

          बन्दरों का एक समूह था, जो फलो के बगिचों मे फल तोड़ कर खाया करते थे। माली की मार और डन्डे भी खाते थे, रोज पिटते थे ।
उनका एक सरदार भी था जो सभी बंदरो से ज्यादा समझदार था। एक दिन बन्दरों के कर्मठ और जुझारू सरदार ने सब बन्दरों से विचार-विमर्श कर निश्चय किया कि रोज माली के डन्डे खाने से बेहतर है कि यदि हम अपना फलों का बगीचा लगा लें तो इतने फल मिलेंगे की हर एक के हिस्से मे 15-15 फल आ सकते है, हमे फल खाने मे कोई रोक टोक भी नहीं होगी और हमारे *अच्छे दिन आ जाएंगे* ।
सभी बन्दरों को यह प्रस्ताव बहुत पसन्द आया । जोर शोर से गड्ढे खोद कर फलो के बीज बो दिये गये ।
पूरी रात बन्दरों ने बेसब्री से इन्तज़ार किया और सुबह देखा तो फलो के पौधे भी नहीं आये थे ! जिसे देखकर बंदर भड़क गए और सरदार को गरियाने लगे और नारे लगाने लगे, "कहा है हमारे 15-15 फल", *"क्या यही अच्छे दिन है?"*। सरदार ने इनकी मुर्खता पर अपना सिर पिट लिया और हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए बोला, "भाईयो और बहनो, अभी तो हमने बीज बोया है, मुझे थोड़ा समय और दे दो, फल आने मे थोड़ा समय लगता है।" इस बार तो बंदर मान गए।
                       दो चार दिन बन्दरों ने और इन्तज़ार किया, परन्तु पौधे नहीं आये, अब मुर्ख बन्दरों से नही रहा गया तो उन्होंने मिट्टी हटाई - देखा फलो के बीज जैसे के तैसे मिले ।
                          बन्दरों ने कहा - सरदार फेकु है, झूठ बोलते हैं । हमारे कभी अच्छे दिन नही आने वाले । हमारी किस्मत में तो माली के डन्डे ही लिखे हैं और बन्दरों ने सभी गड्ढे खोद कर फलो के बीज निकाल निकाल कर फेंक दिये । पुन: अपने भोजन के लिये माली की मार और डन्डे खाने लगे ।
(बनारस, 04 नवंबर 2017, शनिवार)
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रविवार, 29 अक्तूबर 2017

व्योमवार्ता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी के पुराने पन्ने

  दो वर्ष पूर्व 29 अक्टूबर  2015 को लिखी व फेसबुक  पर पोस्ट की व्यंग्य रचना

प्रधानमंत्री  जी के नाम भैंस का खुला खत

प्रधानमंत्री जी,
सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं ना आज़म खां की भैंस हूं और ना लालू यादव की!
ना मैं कभी रामपुर गयी ना पटना! मेरा उनकी भैंसों से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है।
यह सब मैं इसलिये बता रही हूं कि कहीं आप मुझे विरोधी पक्ष की भैंस ना समझे लें।
मैं तो भारत के करोड़ों इंसानों की तरह आपकी बहुत बड़ी फ़ैन हूं।
जब आपकी सरकार बनी तो जानवरों में सबसे ज़्यादा ख़ुशी हम भैंसों को ही हुई थी।
हमें लगा कि ‘अच्छे दिन’ सबसे पहले हमारे ही आयेंगे।लेकिन हुआ एकदम उल्टा! आपके राज में तो हमारी और भी दुर्दशा हो गयी।
अब तो जिसे देखो वही गाय की तारीफ़ करने में लगा हुआ है। कोई उसे माता बता रहा है तो कोई बहन! अगर गाय माता है तो हम भी तो आपकी चाची, ताई, मौसी, बुआ कुछ लगती ही होंगी!
हम सब समझती हैं। हम अभागनों का रंग काला है ना! इसीलिये आप इंसान लोग हमेशा हमें ज़लील करते रहते हो और गाय को सर पे चढ़ाते रहते हो!
आप किस-किस तरह से हम भैंसों का अपमान करते हो, उसकी मिसाल देखिये।
आपका काम बिगड़ता है अपनी ग़लती से और टारगेट करते हो हमें कि
देखो गयी भैंस पानी में
गाय को क्यूं नहीं भेजते पानी में! वो महारानी क्या पानी में गल जायेगी?
आप लोगों में जितने भी लालू लल्लू हैं, उन सबको भी हमेशा हमारे नाम पर ही गाली दी जाती है
काला अक्षर भैंस बराबर
माना कि हम अनपढ़ हैं, लेकिन गाय ने क्या पीएचडी की हुई है?
जब आपमें से कोई किसी की बात नहीं सुनता, तब भी हमेशा यही बोलते हो कि
भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फ़ायदा!
आपसे कोई कह के मर गया था कि हमारे आगे बीन बजाओ? बजा लो अपनी उसी प्यारी गाय के आगे!
अगर आपकी कोई औरत फैलकर बेडौल हो जाये तो उसे भी हमेशा हमसे ही कंपेयर करोगे कि
भैंस की तरह मोटी हो गयी हो
करीना; कैटरीना गाय और डॉली बिंद्रा भैंस! वाह जी वाह!
गाली-गलौच करो आप और नाम बदनाम करो हमारा कि
भैंस पूंछ उठायेगी तो गोबर ही करेगी
हम गोबर करती हैं तो गाय क्या हलवा करती है?
अपनी चहेती गाय की मिसाल आप सिर्फ़ तब देते हो, जब आपको किसी की तारीफ़ करनी होती है-
वो तो बेचारा गाय की तरह सीधा है, या- अजी, वो तो राम जी की गाय है!
तो गाय तो हो गयी राम जी की और हम हो गये लालू जी के!
वाह रे इंसान! ये हाल तो तब है, जब आप में से ज़्यादातर लोग हम भैंसों का दूध पीकर ही सांड बने घूम रहे हैं।
उस दूध का क़र्ज़ चुकाना तो दूर, उल्टे हमें बेइज़्ज़त करते हैं! आपकी चहेती गायों की संख्या तो हमारे मुक़ाबले कुछ भी नहीं हैं। फिर भी, मेजोरिटी में होते हुए भी हमारे साथ ऐसा सलूक हो रहा है!
प्रधानमंत्री जी, आप तो मेजोरिटी के हिमायती हो, फिर हमारे साथ ऐसा अन्याय क्यूं होने दे रहे हो?
प्लीज़ कुछ करो!
आपके ‘कुछ’ करने के इंतज़ार में – 
     आपकी एक तुच्छ प्रशंसक!
(बनारस, 29अक्टूबर 2015)
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सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

सन 2017 मे भारतीय स्टेट बैंक की आधुनिक सेवा और कम्प्यूटर पर सन 57 की मिसेज गुप्ता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 12 अक्टूबर 2017, शुक्रवार

सन 2017 मे भारतीय स्टेट बैंक की आधुनिक सेवा और कम्प्यूटर पर सन 57 की  मिसेज गुप्ता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 12 अक्टूबर 2017, शुक्रवार

                        जरूरी नहीं की पापों के प्रायश्चित के लिए दान पुण्य ही किया जाए । स्टेट बैंक में खाता खुलवा कर भी प्रायश्चित किया जा सकता है । छोटा मोटा पाप हो तो बैलेंस पता करने चले जाएँ ।
चार काउन्टर पर धक्के खाने के बात पता चलता है कि , बैलेंस गुप्ता मैडम बताएगी । गुप्ता मैडम का काउन्टर कौनसा है ये पता करने के लिए फिर किसी काउन्टर पर जाना पड़ता है ।
          लेवल वन कम्प्लीट हुआ । यानी गुप्ता मैडम का काउन्टर पता चल गया है । लेकिन अभी थोड़ा वैट करना पड़ेगा क्योंकि गुप्ता मैडम अभी सीट पर नहीं है ।
            आधे घंटे बाद चश्मा लगाए पल्लू संभालती हुई युनिनोर की 2g स्पीड से चलती हुई गुप्ता मैडम सीट पर आती है । आप मैडम को खाता नंबर देकर बैलेंस पूछते है ।
              गुप्ता मैडम पहले तो आपको इस तरह घूरती है जैसे आपने उसकी बेटी का हाथ मांग लिया है । आप अपना थोबड़ा ऐसे बना लेते है जैसे सुनामी में आपका सबकुछ उजड़ गया है और आज की तारिख में आपसे बड़ा लाचार दुखी कोई नहीं है ।
गुप्ता मैडम को आपके थोबड़े पर तरस आ जाता है और बैलेंस बताने जैसा भारी काम करने का मन बना लेती है । लेकिन इतना भारी काम अकेली अबला कैसे कर सकती है ? तो मैडम सहायता के लिए आवाज लगाती है -
- मिश्राजी ....ये बैलेंस कैसे पता करते है ?
मिश्राजी अबला की करुण पुकार सुनकर अपने ज्ञान का खजाना खोल देते है ।
- पहले तो खाते के अंदर जाकर क्लोजिंग बैलेंस पर क्लिक करने पर बैलेंस आ जाता था । लेकिन अभी सिस्टम चैंज हो गया है ...अभी आप f5 दबाएँ और इंटर मारदे तो बैलेंस दिखा देगा ।
गुप्ता मैडम चश्मा ठीक करती है , तीन बार मोनिटर की तरफ और तीन बार की - बोर्ड की तरफ नजर मारती है । फिर उंगलियाँ की - बोर्ड पर ऐसे फिरातीं है जैसे कोई तीसरी क्लास का लड़का वर्ल्ड मैप में सबसे छोटा देश मस्कट ढूंढ रहा हो । मैडम फिर मिश्रा जी को मदद के लिए पुकारती है -
- मिश्रा जी , ये f5 किधर है ?
मैडम की उम्र पचास से ऊपर होने के कारण शायद मिश्राजी पास आकर मदद करने की जहमत नहीं उठाते । इसलिए वहीँ बैठे बैठे जोर से बोलते है -
- की बोर्ड में सबसे ऊपर देखिये मैडम ।
- लेकिन सबसे ऊपर तो तीन बतियां जल रही है ।
- हां उन बतियों से नीचे है ...लम्बी लाईन है f1 से लेकर f12 तक ।
फायनली मैडम को f5 मिल जाता है । मैडम झट से बटन दबा देती है । मोनिटर पर आधे घंटे जलघड़ी ( कुछ लोग उसे डमरू समझते है ) बनी रहती है । अंत में एक मैसेज आता है -
Session expired. Please check your connection.
मैडम अपने हथियार डाल देती है । एक नजर आपके गरीबी लाचारी से पुते चेहरे पर डालती है और कहती है -
- सॉरी .....सर्वर में प्रोब्लम है ।
कहने का टोन ठीक वैसा ही होता है जैसे पुरानी फिल्मो में डोक्टर ओपरेशन थियेटर से बाहर आकर कहता था -
" सॉरी .....हमने बहुत कोशिश की पर ठाकुर साहब को नहीं बचा पाए "
(बनारस, 12 अक्टूबर 2017, शुक्रवार)
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बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

व्योमवार्ता, हिन्दुस्तान मे अब्दुल्ला परेशान है : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 11अक्टूबर 2017, बुधवार

अब तो इस मुल्क में दलितों और अल्पसंख्यको का जीना मुश्किल हो गया है,
इतना बड़बड़ाते हुए अब्दुल्ला...

1-- अपने 8वें बच्चे की डिलीवरी के लिए जिला अस्पताल के डॉक्टर से मिलने पहुँच गया !

2--और 6000 रु लेकर मोदी को गालियाँ देते हुए घर चला आया !

3-- उसकी तीसरी बेगम ने फ्री में मिले सिलेंडर को ऑन किया और गोश्त गरम किया, अब्दुल्ला ने खाया और बच्चों को भी  खिलाया और सुलाया !

4--फिर सुबह योगी को कोसते हुए ग्रामीण बैंक पहुँच गया और लोन माफी का सर्टिफिकेट प्राप्त किया !

5--फिर अपने सातों बच्चों को स्कूल से मिली free वाली नई  ड्रेस पहना कर स्कूल भेजा !
और बच्चों को समझाया देखो स्कूल में वंदे मातरम् और भारत माता की जय मत, ये बोलना इस्लाम में गुनाह होता है !

6-- फिर बच्चों को याद दिलाया कि अल्प संख्यक वजीफे वाला फार्म ज़रूर ले कर आना,
फीस तो खैर पहले से ही माफ है !

7-- स्कूल से आने के बाद बच्चों ने बकरियों के लिए हरे हरे पेड़ की पत्तियां तोड़ी,
कुछ पेड़ अब्दुल्ला काट कर पहले ही लकड़ी बेंच चुका है !

8-- ईद पर गली के चौराहे पर बकरे और गाय की कुर्बानी तो पिछले कई साल से दे ही रहा है,अब्दुला !

9--इधर रोहिंग्या मुसलमानो की स्थिति को लेकर अब्दुल्ला बहुत चिंतित रहता है !

10-- उधर चीन ने भी धोखा दे दिया, हिंदुस्तान पर हमला ही नही किया !

11-- पाकिस्तान की निंदा, वो भी चीन की धरती से...
ये बात बड़ी बुरी लगी अब्दुल्ला को !

12-- अब्दुल्ला कल मुफ्त शौचालय के बारे में पता करने जाएगा साथ ही मुफ्त मकान की भी जानकारी प्राप्त करेगा,
बिजली तो सालो से फ्री में जला ही रहा हैं वो...

*लेकिन एक बात जान लो...*
*अब्दुल्ला भारत में खुश नही है... !!*
(बनारस, 11अक्टूबर 2017, बुधवार)
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रविवार, 1 अक्तूबर 2017

विजय पर्व के पश्चात : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 01 अक्टूबर 2017, रविवार

विजय पर्व के पश्चात : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 01 अक्टूबर 2017, रविवार
आज जब नवरात्रि के व्रत के पश्चात व विजयादशमी के त्यौहार मना कर फुर्सत मे बैठा तो संपूर्ण रामकथा पर विचार करने लगा और ढेरो सवाल एक के बाद किन्तु परन्तुक रूप मे उठने लगे, चार दिन पूर्व दूरदर्शन लोकसभा पर रामकथा के प्रख्यात उपन्यासकार परम आदरणीय पद्मश्री डॉ0 नरेन्द्र कोहली जी ( हमारे गुरू जी) ने राम कथा के पात्रों के वर्तमान सरोकार व प्रासंगिकता पर बताते हुये कहा कि वृत्ति ही मानव को दानव बनाती है. वर्तमान परिस्थिति मे रामकथा पर विचार करते समय इन्ही प्रवृत्तियों पर मन मे ढेरो सवाल उठ रहे हैं.
राम से उदास जीवन किसका होगा? सीता से ज्यादा किसने सहा होगा? लक्ष्मण से ज्यादा समर्पण कौन करेगा ? दशरथ से ज्यादा कौन त्यागी  होगा ? कैकेयी से |ज्यादा क्रूरता किसने दिखाई होगी? हनुमान से ज्यादा भक्त कौन होगा?रावण से ज्यादा विद्वान शत्रु कौन होगा ?तु3लसीदास से ज्यादा बेहतर कविता कौन लिख सकेगा ?  रामचरितमानस और उसके सभी पात्र हमारे आदर्श हैं ,दुश्मनी करो तो रावण जैसे ,प्रेम करो तो सीता जैसे , धर्म निभाओ तो राम जैसे? त्याग करो तो दशरथ जैसे|
           तभी रामकथा की सार्थकता होगी.
(झूंसी, इलाहाबाद, 01 अक्टूबर,2017, रविवार)
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शनिवार, 23 सितंबर 2017

व्योमवार्ता : नही चाहिये ऐसी सरकार : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 23 सितंबर 2017, शनिवार

नही चाहिये ऐसी सरकार : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 23 सितंबर 2017, शनिवार

2014 मे मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने से पहले तक चारो तरफ खुशहाली थी। 

देश के किसान चार्टेड प्लेन से गर्मी की छुट्टिया बिताने स्विट्जरलैंड जाया करते थे।

समाज मैं इतना भाईचारा था की लोग दिन रात एक दूसरे को प्यार से पुचकारते हुए चलते थे l

सामाजिक सौहार्द उच्च स्तर​ का था , सारे लोग सेक्युलर थे , टोपी तिलक कोई दूर दूर तक नहीं जनता था l

आतंकवादी AK 47 का प्रयोग नहीं करते थे बल्कि अपनी देशविरोधी मांगे मनवाने के लिए अनशन किया करते थे।

देश मे विदेशी मुद्रा का भंडार इतना अधिक था की उस पैसे को रखने की जगह हमारे पास नहीं थी,
और हमारी सरकार सऊदी अरब और अमेरिका जैसे गरीब देशों को कर्ज दिया करती थी l

व्यापारी बहुत खुश था , उस पर कोई Tax नहीं लगता था l

देश की सारी सड़के 8 लेन की थी और 100 किमी से अधिक की दूरी लोग बुलेट ट्रैन से ही तय किया करते थे।

देश के हर घर में 24 घंटे बिजली आती थी।इन्वर्टर और जेनरेटर का नाम किसी को नहीं पता था।

देश के हर घर में RO के पानी की सप्लाई होती थी हर व्यक्ति के पास रोजगार था।

फिर एक दिन संघी लोगो ने EVM में गड़बड़ी कर, पूरे देश की मशीन सेट कर दी ,
सुना है ऐसा करने के लिए अमित शाह और मोदी ने मिस्टर इंडिया फिल्म में प्रयुक्त घड़ी का प्रयोग किया और इसलिए उनको कोई देख नहीं पाया।

इस प्रकार से देश की राजमाता और उनके राजवंश के इकलौते सुपुत्र के जन्मजात हक़ पर लात मर कर इन संघी लोगो ने सत्ता  हासिल की।

*देश की सत्ता एक गैर कुलीन  के हाथ आते ही सारे सुख वैभव नष्ट हो गये l

सड़को से अचानक 7-7 लेन गायब हो गए और बचे हुए 1 लेन मैं भी बड़े बड़े गड्ढे हो गए।

हजारों गांवों के बिजली के खंभे उखड़वा दिए गए। अब हर घर में 24 की जगह 4-5घंटे की सप्लाई होने लगी।

RO के पानी की सप्लाई रोक दी गई।

देश के किसान अचानक गरीब हो गए क्योंकि संघियो ने उनकी फसलों पर टिड्डियाँ  छोड़ दी थी।

देश के चार्टर्ड प्लेन अदृय्ष्य हो गए, जो बच गए वो मोदी ने अपने निजी प्रयोग मैं ले लिए।

इसके तुरंत बाद जनता के सारे पैसे स्विस अकाउंट मैं ट्रांसफर कर के उनको  भूखो मरने को मजबूर कर दिया गया ।*

*_हद तो तब हो गयी जब हमारे देश की सभ्य जनता से मोदी ने स्वछता की अपील की l

व्यापारियों पर अत्याचार का आलम ये की जो बेचारे 4-5 पुश्तों से एक पैसा टैक्स भरे बिना व्यापर कर रहे थे, उनको GST के नाम पर टैक्स देने को मजबूर कर दिया।

देश भर की योजनाओ को आधार कार्ड से जोड़कर करोड़ो रूपये की बचत की और जनता का बेईमानी कर खाने का बुनियादी हक़ भी छीन लिया गया।

तमाम सेक्युलर पत्रकार जो बेचारे किसी तरह गरीबी मैं सरकारी दारू और NGO के फण्ड पर अपना जीवन चला रहे थे ,
उनके धनस्रोत विदेशी NGO  बंद कर उनको भूखो मरने पर मजबूर कर दिया गया।_*

*ऐसी निर्दयी सरकार को पुनः चुने जाने का कोई हक़ नहीं l

मुझे मेरा पप्पू, लालू,ममता , और वही मनमोहन चाहिए , मुझे बापस वही लाखो करोड़ के घोटाले चाहिए।

नहीं चाहिए मुझे ऐसे संघी सरकार जो मेरे किसी भी प्रकार के चोरी करने के हक़ को नुक्सान पहुँचती हो।

  नहीं चाहिए बुलेट ट्रैन , उसकी पटरी पर शौच करने की सुविधा तक नहीं होती।

नहीं चाहिए हाइवेज जिन पर तेज गति से चलते हुए वाहन हमारे बच्चो को नुक्सान पंहुचा सके।

नहीं चाहिए ऐसी सरकार जो हमारे 32 -35 साल के नौजवानो को देश विरोधी नारे लगाने मात्र पर केस कर दे ।

नहीं चाहिए ऐसी सरकार जो आतंकवादीयों को पापीस्तान और म्यांमार में घुसकर  मारे,

नहीं चाहिए ऐसी सरकार जो कश्मीर के आतंकियों का लिस्ट बनाकर सफाया करवाएं।

नहीं चाहिए ऐसी सरकार जो हर गरीब महिलाओं को गैस का कनेक्शन दे।

नहीं चाहिए मुझे रेलवे स्टेशन पर ₹ 5/ltr में RO का पानी देने वाली सरकार मैं तो ₹20 वाली बोतल खरीदूंगा।*

_*नहीं चाहिए मोदी सरकार गो बैक। .. राजमाता एंड पप्पू कम  बैक। .. :*_
(बनारस, 23 सितंबर 2017, शनिवार)
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व्योमवार्ता : नही है जबाब मॉ के पास? : व्योमेश चित्रवंश ती डायरी,23 सितंबर 2016, शुक्रवार

नही है जबाब मॉ के पास: व्योमेश चित्रवंश की डायरी,23 सितंबर 2016,शुक्रवार

ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये हैं?
( एक कविता जो मुझे सोशल मीडिया से प्राप्त हुई है. जिसे पढने के बाद गला रूद्ध है,ऑखे बरबस ही डबडबा आई है. मन मे आक्रोश कि वीर जवानों के शहादत के बजाय ऐसी बोझिल मनस्थिति की कविताओं को हम कब तक पढ़ते रहेगें ?)
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ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये हैं?
माँ मेरा मन बात ये समझ ना पाये है,
ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये हैं?
पहले पापा मुन्ना मुन्ना कहते आते थे,
टॉफियाँ खिलोने साथ में भी लाते थे।
गोदी में उठा के खूब खिलखिलाते थे,
हाथ फेर सर पे प्यार भी जताते थे।
पर ना जाने आज क्यूँ वो चुप हो गए,
लगता है की खूब गहरी नींद सो गए।
नींद से पापा उठो मुन्ना बुलाये है,
ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये हैं?

फौजी अंकलों की भीड़ घर क्यूँ आई है,
पापा का सामान साथ में क्यूँ लाई है।
साथ में क्यूँ लाई है वो मेडलों के हार ,
आंख में आंसू क्यूँ सबके आते बार बार।
चाचा मामा दादा दादी चीखते है क्यूँ,
माँ मेरी बता वो सर को पीटते है क्यूँ।
गाँव क्यूँ शहीद पापा को बताये है,
ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये हैं?

माँ तू क्यों है इतना रोती ये बता मुझे,
होश क्यूँ हर पल है खोती ये बता मुझे।
माथे का सिन्दूर क्यूँ है दादी पोछती,
लाल चूड़ी हाथ में क्यूँ बुआ तोड़ती।
काले मोतियों की माला क्यूँ उतारी है,
क्या तुझे माँ हो गया समझना भारी है।
माँ तेरा ये रूप मुझे ना सुहाये है,
ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये है।
पापा कहाँ है जा रहे अब ये बताओ माँ,
चुपचाप से आंसू बहा के यूँ सताओ ना।
क्यूँ उनको सब उठा रहे हाथो को बांधकर,
जय हिन्द बोलते है क्यूँ कन्धों पे लादकर।
दादी खड़ी है क्यूँ भला आँचल को भींचकर,
आंसू क्यूँ बहे जा रहे है आँख मींचकर।
पापा की राह में क्यूँ फूल ये सजाये है,
ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये हैं?

क्यूँ लकड़ियों के बीच में पापा लिटाये है,
सब कह रहे है लेने उनको राम आये है।
पापा ये दादा कह रहे तुमको जलाऊँ मैं,
बोलो भला इस आग को कैसे लगाऊं मैं।
इस आग में समा के साथ छोड़ जाओगे,
आँखों में आंसू होंगे बहुत याद आओगे।
अब आया समझ माँ ने क्यूँ आँसू बहाये थे,
ओढ़ के तिरंगा पापा घर क्यूँ आये थे ?
(बनारस,23 सितंबर 2016, शुक्रवार)
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